Psychology: 257 MCQs with Answers

Psychology Questions and Answers - India Study Institute
Psychology

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Psychology Questions and Answers

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Psychology is one of the most important sections of the Haryana Teacher Eligibility Test (HTET). A strong understanding of Child Psychology, Learning Theories, Intelligence, Motivation, Personality, Inclusive Education, and Educational Psychology can significantly improve your HTET score. On this page, you will find comprehensive HTET Psychology Notes, chapter-wise multiple-choice questions (MCQs), previous year questions with detailed explanations, practice tests, and important concepts based on the latest HTET syllabus.

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Other Exam Papers:

Q21. निम्नलिखित में से कौन-सा शिक्षण-अधिगम को प्रभावित करने वाला वातावरणीय कारक नहीं है ?

Right Answer: परिपक्वता


Explanation:

परिपक्वता एक आंतरिक और जैविक (Biological/Internal) प्रक्रिया है। यह छात्र के शारीरिक और मानसिक विकास (उम्र के साथ समझ और क्षमताओं का बढ़ना) से संबंधित है। किसी भी चीज़ को सीखने के लिए छात्र का शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होना ज़रूरी है, लेकिन यह उसका 'व्यक्तिगत कारक' (Personal factor) है, न कि कोई बाहरी या 'वातावरणीय कारक' (Environmental factor)।

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Q22. निम्नलिखित में से कौन-सी समावेशी शिक्षा की एक विशेषता नहीं है ?

Right Answer: यह अशक्त बच्चों की विशिष्ट शिक्षा तक सीमित रहती है


Explanation:

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) का मूल मंत्र 'सभी के लिए शिक्षा' है। यह केवल अशक्त (विकलांग/दिव्यांग) बच्चों तक सीमित नहीं है। समावेशी शिक्षा का अर्थ है—सामान्य बच्चों, अशक्त बच्चों, प्रतिभाशाली बच्चों और समाज के हर वर्ग (विभिन्न भाषा, जाति, धर्म) के बच्चों को एक ही नियमित कक्षा में एक साथ बैठाकर पढ़ाना।

केवल अशक्त बच्चों को अलग से पढ़ाना "विशिष्ट शिक्षा" (Special Education) कहलाता है, जो समावेशी शिक्षा के बिल्कुल विपरीत अवधारणा है। इसलिए यह कथन समावेशी शिक्षा की विशेषता नहीं है।

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Q23. कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धान्त की निम्नलिखित अवस्थाओं को उनकी विशेषता के साथ सुमेलित कीजिए :

नैतिक अवस्थाएंविशेषता 
(a) इनाम के लालच में अनुपालन(i) दूसरों की स्वीकृति पाना
(b) सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना अवस्था(ii) स्वार्थपूर्ति पर आधारित 
(c) अच्छे अन्तः वैयक्तिक संबंध(iii) अन्तःकरण द्वारा मान्य शाश्वत मूल्य
(d) सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त(iv) न्याय एवं कानून को महत्त्व 

सही कूट का चयन कीजिए :

Right Answer: (a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)


Explanation:

कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धान्त की अवस्थाओं की व्याख्या

लॉरेंस कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को 3 मुख्य स्तरों और 6 अवस्थाओं में बांटा है। दिए गए विकल्पों का सही मिलान और उसका कारण इस प्रकार है:

  • (a) इनाम के लालच में अनुपालन ➔ (ii) स्वार्थपूर्ति पर आधारित यह 'पूर्व-पारंपरिक स्तर' (Pre-conventional level) की दूसरी अवस्था (साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता) है। इसमें बच्चे का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि कोई कार्य करने से उसे क्या व्यक्तिगत लाभ या इनाम मिलेगा। यह पूरी तरह से स्वार्थ और अपनी जरूरतों को पूरा करने पर आधारित होता है।
  • (b) सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना अवस्था ➔ (iv) न्याय एवं कानून को महत्त्व यह 'पारंपरिक स्तर' (Conventional level) की चौथी अवस्था है। इस चरण में व्यक्ति यह समझने लगता है कि समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए सामाजिक नियमों, कानूनों और न्याय व्यवस्था का सम्मान करना और उनका पालन करना आवश्यक है।
  • (c) अच्छे अन्तः वैयक्तिक संबंध ➔ (i) दूसरों की स्वीकृति पाना यह 'पारंपरिक स्तर' की तीसरी अवस्था है, जिसे "अच्छा लड़का/अच्छी लड़की" (Good boy-Good girl) अवस्था भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति अपने परिवार या समाज में दूसरों की नज़र में अच्छा बनने और उनकी प्रशंसा या स्वीकृति पाने के लिए नैतिक व्यवहार करता है।
  • (d) सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त ➔ (iii) अन्तःकरण द्वारा मान्य शाश्वत मूल्य यह 'उत्तर-पारंपरिक स्तर' (Post-conventional level) की छठी और सर्वोच्च अवस्था है। यहाँ व्यक्ति समाज के स्थापित कानूनों से भी ऊपर उठकर मानवता, न्याय, समानता और अपने अन्तःकरण (अंतरात्मा) के शाश्वत मूल्यों के आधार पर निर्णय लेता है।
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Q24. सर्जनशील बच्चों की पहचान हेतु शिक्षक द्वारा कौन-से परीक्षण प्रशासित किए जा सकते हैं ?

(a) आकृति निर्माण परीक्षण

(b) उत्पाद उन्नयन परीक्षण

(c) प्रचलित उपयोग परीक्षण

(d) चित्र पूर्ति परीक्षण

सही कूट का चयन कीजिए :

Right Answer: (a), (b) एवं (d)


Explanation:

सर्जनशील (Creative) बच्चों की पहचान करने के लिए अपसारी चिंतन (Divergent Thinking) और नवीनता का मापन किया जाता है। दिए गए परीक्षणों का विश्लेषण इस प्रकार है:

(a) आकृति निर्माण परीक्षण (Figure construction test): यह परीक्षण सृजनात्मकता को मापता है। इसमें बच्चे को कुछ बुनियादी आकार (जैसे गोला, त्रिभुज) दिए जाते हैं और उनसे कोई नई और मौलिक आकृति बनाने को कहा जाता है।

(b) उत्पाद उन्नयन परीक्षण (Product improvement test): यह भी सृजनात्मकता का एक प्रमुख परीक्षण है। इसमें बच्चे को कोई साधारण वस्तु या खिलौना दिया जाता है और पूछा जाता है कि इसे और अधिक मजेदार या उपयोगी बनाने के लिए इसमें क्या बदलाव किए जा सकते हैं।

(c) प्रचलित उपयोग परीक्षण (Usual uses test): यह विकल्प गलत है। सृजनात्मकता मापने के लिए 'अप्रचलित या नवीन उपयोग परीक्षण' (Unusual uses test) का प्रयोग किया जाता है (जैसे- ईंट के नए-नए उपयोग बताना)। 'प्रचलित' (Usual) उपयोग बताना सामान्य बुद्धि या स्मृति का हिस्सा है, सृजनात्मकता का नहीं।

(d) चित्र पूर्ति परीक्षण (Picture completion test): यह सृजनात्मकता का एक महत्वपूर्ण अशाब्दिक परीक्षण है। इसमें अधूरी रेखाओं या चित्रों को पूरा करके एक अर्थपूर्ण और मौलिक चित्र बनाने के लिए कहा जाता है।

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Q25. पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त के अनुसार, जब अधिगमकर्ता अपने और अपने पर्यावरण के बीच उचित तालमेल बनाए रखता है, तो यह प्रक्रिया कहलाती है :

Right Answer: संतुलनीकरण


Explanation:

जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) सिद्धान्त में, संतुलनीकरण (Equilibration) वह जैविक और मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक बच्चा (अधिगमकर्ता) अपनी समझ और बाहरी दुनिया (पर्यावरण) के बीच संतुलन (Balance) स्थापित करता है।

इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए पियाजे द्वारा बताई गई अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को समझना भी जरूरी है:

  • आत्मसातीकरण (Assimilation): जब कोई बच्चा किसी नई जानकारी या नए अनुभव को अपने पहले से मौजूद ज्ञान या विचार (जिसे पियाजे 'स्कीमा' कहते हैं) में आसानी से फिट कर लेता है, तो उसे आत्मसातीकरण कहते हैं।
    • उदाहरण: एक बच्चे ने कुत्ते को देखा है जिसके चार पैर हैं। जब वह पहली बार किसी बिल्ली को देखता है, तो वह उसे भी 'कुत्ता' ही कहता है।
  • समायोजीकरण / समायोजन (Accommodation): जब नई जानकारी बच्चे की पुरानी समझ से मेल नहीं खाती (यानी असंतुलन पैदा होता है), तो बच्चा अपने पुराने ज्ञान (स्कीमा) में बदलाव या संशोधन करता है।
    • उदाहरण: जब बच्चे को पता चलता है कि यह जानवर भौंकता नहीं बल्कि म्याऊँ करता है, तो वह अपने दिमाग में बिल्ली के लिए एक नया 'स्कीमा' (विचार) बनाता है।
  • संतुलनीकरण (Equilibration): यह आत्मसातीकरण और समायोजीकरण के बीच की कड़ी है। बच्चा लगातार अपने पर्यावरण से नई चीजें सीखता है। जब पुरानी समझ काम नहीं आती (असंतुलन या Disequilibrium), तो वह नई समझ (Accommodation) विकसित करता है। इस पूरी प्रक्रिया के माध्यम से अपने मानसिक विचारों और बाहरी पर्यावरण के बीच एक सफल तालमेल (Balance) बनाए रखने की प्रक्रिया को ही 'संतुलनीकरण' या 'साम्यधारण' कहा जाता है।
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Q26. प्रारंभिक किशोरावस्था में संवेगों के संबंध में कौन-सा विकल्प सही है ?

Right Answer: अनियंत्रित एवं अयुक्तिसंगत


Explanation:

प्रारंभिक किशोरावस्था (Early Adolescence - लगभग 10 से 14 वर्ष की आयु) में बच्चों के शारीरिक, मानसिक और हार्मोनल स्तर पर बहुत तीव्र बदलाव होते हैं। मनोवैज्ञानिक जी. स्टेनली हॉल ने किशोरावस्था को "तनाव और तूफान" (Storm and Stress) की अवस्था कहा है।

इस उम्र में संवेगों (Emotions) की प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • अनियंत्रित (Uncontrolled): प्रारंभिक किशोरावस्था में संवेग बहुत तीव्र होते हैं और किशोरों का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण बहुत कम होता है। वे अचानक से बहुत अधिक गुस्सा हो सकते हैं, या छोटी सी बात पर बहुत अधिक दुखी हो सकते हैं। उनके मूड में तेजी से बदलाव (Mood swings) आना इस अवस्था की एक सामान्य विशेषता है।
  • अयुक्तिसंगत या तर्कहीन (Irrational): इस उम्र में मस्तिष्क का वह हिस्सा (Prefrontal Cortex) जो तार्किक सोच, विवेक और निर्णय लेने को नियंत्रित करता है, पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ होता है। इसके विपरीत, भावनाओं को नियंत्रित करने वाला हिस्सा (Amygdala) अत्यधिक सक्रिय होता है। इसलिए, उनके संवेगात्मक निर्णय अक्सर किसी ठोस तर्क या विवेक पर आधारित नहीं होते हैं; वे बस भावनाओं के बहाव में आकर प्रतिक्रिया देते हैं।
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Q27. बण्डूरा के सामाजिक अधिगम सिद्धान्त के सोपानों को क्रम से व्यवस्थित कीजिए :

(a) व्यवहार का प्रत्यक्षीकरण 

(b) व्यवहार का पुनर्बलन

(c) व्यवहार का स्मरण

(d) स्मरण की क्रियात्मक परिणति

सही कूट का चयन कीजिए :

Right Answer: (a), (c), (d), (b)


Explanation:

अल्बर्ट बण्डूरा (Albert Bandura) ने सामाजिक अधिगम का सिद्धान्त (Social Learning Theory) प्रतिपादित किया था, जिसे 'अवलोकनात्मक अधिगम' (Observational Learning) या 'मॉडलिंग' (Modeling) भी कहा जाता है।

बण्डूरा के अनुसार, बच्चे या व्यक्ति दूसरों (मॉडल) के व्यवहार को देखकर सीखते हैं। किसी भी नए व्यवहार को देखकर सीखने की इस प्रक्रिया को बण्डूरा ने चार मुख्य सोपानों (चरणों) में बाँटा है, जिनका सही क्रम इस प्रकार है:

1. अवधान या प्रत्यक्षीकरण (Attention / Perception of behaviour) - (a) सीखने की शुरुआत तब होती है जब व्यक्ति किसी मॉडल (जैसे- शिक्षक, माता-पिता, या टीवी का कोई पात्र) के व्यवहार को पूरे ध्यान से देखता है और उसे समझता (प्रत्यक्षीकरण) है। बिना ध्यान दिए कोई भी व्यवहार सीखा नहीं जा सकता।

2. धारण या स्मरण (Retention / Remember of behaviour) - (c) मॉडल के व्यवहार को ध्यान से देखने के बाद, व्यक्ति उस व्यवहार को अपने मस्तिष्क में स्मृति (Memory) के रूप में सुरक्षित कर लेता है ताकि जरूरत पड़ने पर उसे याद किया जा सके।

3. पुनरुत्पादन या क्रियात्मक परिणति (Reproduction / Convert the memory into action) - (d) इस चरण में व्यक्ति अपने मस्तिष्क में याद की गई बातों (स्मरण) को वास्तविक शारीरिक क्रिया या व्यवहार में बदलने का प्रयास करता है। यानी वह वैसा ही करने की कोशिश करता है जैसा उसने मॉडल को करते हुए देखा था।

4. अभिप्रेरणा या पुनर्बलन (Motivation / Reinforcement of behaviour) - (b) अंतिम चरण में यह तय होता है कि व्यक्ति उस सीखे गए व्यवहार को भविष्य में दोहराएगा या नहीं। यदि मॉडल के समान व्यवहार करने पर व्यक्ति को समाज से तारीफ, पुरस्कार या सकारात्मक 'पुनर्बलन' मिलता है, तो वह उस व्यवहार को अपना लेता है। यदि उसे डांट या सजा मिलती है, तो वह उस व्यवहार को छोड़ देता है।

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Q28. समावेशी शिक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित में से कौन-सी निःशक्त बच्चों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए ?

Right Answer: दूसरों पर निर्भर रहने की आवश्यकता


Explanation:

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) का मुख्य उद्देश्य सामान्य बच्चों और विशेष आवश्यकता वाले (निःशक्त/दिव्यांग) बच्चों को एक ही छत के नीचे, एक साथ शिक्षा प्रदान करना है। इसका सबसे बड़ा लक्ष्य निःशक्त बच्चों को आत्मनिर्भर (Independent) और सशक्त बनाना है, न कि उन्हें दूसरों पर आश्रित (Dependent) रखना।

आइए अन्य विकल्पों को समझें कि वे निःशक्त बच्चों की आवश्यकताएं क्यों हैं:

(1) स्वयं की निःशक्तता से निपटने की आवश्यकता: समावेशी शिक्षा में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि वे अपनी शारीरिक या मानसिक कमियों (निःशक्तता) को स्वीकार करें और आत्मविश्वास के साथ उनका सामना करें। यह उनकी एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।

(2) उचित निर्देशन एवं परामर्श की आवश्यकता: निःशक्त बच्चों को सही शैक्षणिक और करियर मार्गदर्शन के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक परामर्श (Counselling) की बहुत आवश्यकता होती है, ताकि वे हीन भावना का शिकार न हों और सही दिशा में आगे बढ़ सकें।

(3) दूसरों पर निर्भर रहने की आवश्यकता (सही उत्तर): शिक्षा का उद्देश्य ही इंसान को स्वावलंबी (Self-reliant) बनाना है। किसी भी दृष्टि से बच्चों को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि वे अपने जीवन के लिए दूसरों पर निर्भर रहें। इसलिए, यह समावेशी शिक्षा की दृष्टि से कोई आवश्यकता नहीं है।

(4) सहायक उपकरणों की आवश्यकता: दृष्टिबाधित बच्चों के लिए ब्रेल लिपि या ऑडियो बुक्स, श्रवणबाधित बच्चों के लिए हियरिंग एड (Hearing aid), और शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए व्हीलचेयर जैसे सहायक उपकरण (Assistive equipments) उनकी बुनियादी जरूरत हैं। ये उपकरण उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद करते हैं।

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Q29. सीखने की परिस्थिति में सुसंगत तथ्यों को असुसंगत तथ्यों से अलग करके प्रस्तुत करना, सीखने के किस नियम का परिचायक है ?

Right Answer: तत्त्व प्रबलता का नियम


Explanation:

यह प्रश्न प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ई. एल. थार्नडाइक (E. L. Thorndike) के सीखने के नियमों (Laws of Learning) से संबंधित है। थार्नडाइक ने सीखने के 3 मुख्य (Primary) नियम और 5 गौण (Secondary) नियम दिए थे। यह प्रश्न उनके गौण नियमों पर आधारित है।

(3) तत्त्व प्रबलता का नियम (Principle of prepotency of elements): इसे 'आंशिक क्रिया का नियम' (Law of Partial Activity) भी कहा जाता है। इस नियम के अनुसार, जब कोई व्यक्ति या अधिगमकर्ता किसी नई परिस्थिति या समस्या का सामना करता है, तो वह पूरी स्थिति पर आँख मूंदकर प्रतिक्रिया करने के बजाय, उसके सबसे महत्वपूर्ण या सुसंगत (Relevant) तत्वों को पहचानता है और अनावश्यक या असुसंगत (Irrelevant) तत्वों को छोड़ देता है। सुसंगत तथ्यों को अलग करके प्रस्तुत करना इसी नियम का हिस्सा है, ताकि बच्चा केवल काम की बातों पर ध्यान केंद्रित कर सके।

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Q30. मैक्डूगल के अनुसार, 'घृणा' का संवेग किस मूल प्रवृत्ति के साथ जुड़ा हुआ है ?

Right Answer: निवृत्ति


Explanation:

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम मैकडूगल (William McDougall) ने मनोविज्ञान में 'मूल प्रवृत्तियों का सिद्धान्त' (Theory of Instincts) प्रतिपादित किया था। उनका मानना था कि मनुष्य के हर व्यवहार के पीछे कोई न कोई मूल प्रवृत्ति होती है।

मैकडूगल ने कुल 14 मूल प्रवृत्तियाँ (Instincts) बताई हैं और स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मूल प्रवृत्ति के जाग्रत होने पर एक विशेष संवेग (Emotion) उत्पन्न होता है।

दिए गए विकल्पों के आधार पर मूल प्रवृत्ति और उनसे जुड़े संवेगों का सही मिलान इस प्रकार है:

(1) निवृत्ति (Repulsion) ➔ घृणा (Disgust) : जब इंसान के सामने कोई सड़ी-गली, खराब या अप्रिय वस्तु/स्थिति आती है, तो वह उससे दूर हटना (निवृत्ति) चाहता है। इस मूल प्रवृत्ति के कारण हमारे अंदर 'घृणा' का संवेग पैदा होता है। (यही इस प्रश्न का सही उत्तर है)।

(2) पलायन (Escape) ➔ भय (Fear) : जब किसी खतरनाक स्थिति का सामना होता है, तो इंसान के अंदर 'भय' या डर का संवेग उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वह वहाँ से भागने (पलायन) की मूल प्रवृत्ति दर्शाता है।

(3) युयुत्सा (Combat) ➔ क्रोध (Anger) : युयुत्सा का अर्थ है युद्ध करने या लड़ने की इच्छा। यह मूल प्रवृत्ति तब जाग्रत होती है जब व्यक्ति के भीतर 'क्रोध' (गुस्सा) का संवेग हावी होता है।

(4) जिज्ञासा (Curiosity) ➔ आश्चर्य (Wonder) : जब हम कोई नई, अनोखी या रहस्यमयी चीज़ देखते हैं तो हमें 'आश्चर्य' का संवेग महसूस होता है, जो हमारे अंदर उस चीज़ के बारे में और अधिक जानने की 'जिज्ञासा' (मूल प्रवृत्ति) पैदा करता है।

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Q31. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन उत्तर बाल्यावस्था की दल-क्रियाओं का उनके अधिगम पर सकारात्मक प्रभाव सुनिश्चित नहीं करता ?

Right Answer: पूर्वाग्रही मनोवृत्ति धारण करते हैं


Explanation:

उत्तर बाल्यावस्था (लगभग 9 से 12 वर्ष) को दल-आयु भी कहा जाता है, क्योंकि इस अवस्था में बच्चे समवयस्क दलों में अत्यधिक सक्रिय रहते हैं। इन दल-क्रियाओं से वे अनुरूप व्यवहार सीखते हैं, सामाजिक मानदण्डों का पालन करना सीखते हैं तथा सामाजिक अंतर्दृष्टि विकसित करते हैं — ये तीनों अधिगम पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। किन्तु दल के प्रति अतिनिष्ठा के कारण बच्चे अपने समूह के पक्ष में और अन्य समूहों के विरुद्ध पूर्वाग्रही मनोवृत्ति भी धारण कर लेते हैं। पूर्वाग्रह चिंतन को संकुचित करता है और वस्तुनिष्ठ अधिगम में बाधा डालता है। अतः विकल्प (4) सही उत्तर है।
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Q32. निम्नलिखित में से कौन-सा अभिप्रेरक अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करता है ?

Right Answer: प्रगति की अनभिज्ञता


Explanation:

अभिप्रेरणा अधिगम की गति, दिशा एवं तीव्रता निर्धारित करती है। लक्ष्य निर्धारण व्यवहार विद्यार्थी को स्पष्ट दिशा और उद्देश्य देता है, सामाजिक अनुमोदन उसे समूह में मान्यता दिलाकर प्रोत्साहित करता है तथा प्रशंसनीय व्यवहार उसके आत्मविश्वास एवं आत्म-सम्मान को बढ़ाता है — ये तीनों अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत यदि विद्यार्थी को अपनी प्रगति की जानकारी ही न हो तो वह न अपनी त्रुटियाँ सुधार पाता है और न ही प्रयास बढ़ा पाता है। प्रगति की अनभिज्ञता वस्तुतः प्रतिपुष्टि के अभाव को दर्शाती है। अतः विकल्प (1) सही उत्तर है।
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Q33. CWSN का अर्थ है :

Right Answer: चिल्ड्रन विथ स्पेशल नीड्स (विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चे)


Explanation:

CWSN का पूर्ण रूप 'Children With Special Needs' अर्थात् 'विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चे' है। इसके अंतर्गत वे बच्चे आते हैं जिन्हें शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक अथवा अधिगम संबंधी कठिनाइयों के कारण सामान्य बच्चों से भिन्न शैक्षिक सहायता की आवश्यकता होती है, जैसे दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, गतिबाधित, मानसिक मंदता तथा अधिगम अक्षमता वाले बच्चे। समावेशी शिक्षा की अवधारणा इन्हीं बच्चों को सामान्य कक्षा में समान अवसर, अनुकूलित पाठ्यक्रम एवं सहायक सामग्री उपलब्ध कराने पर बल देती है। निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम में भी यही शब्दावली प्रयुक्त है। अतः विकल्प (3) सही है।
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Q34. निम्नलिखित में से कौन-सा सीखने को प्रभावित करने वाला अधिगमकर्ता से संबंधित एक व्यक्तिगत कारक नहीं है ?

Right Answer: विषयवस्तु


Explanation:

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है — अधिगमकर्ता से संबंधित व्यक्तिगत कारक तथा विषयवस्तु एवं वातावरण से संबंधित बाह्य कारक। महत्वाकांक्षा, अभिक्षमता और तत्परता तीनों सीखने वाले के भीतर विद्यमान व्यक्तिगत गुण हैं, जो क्रमशः उसकी आकांक्षा के स्तर, अंतर्निहित क्षमता तथा मानसिक एवं शारीरिक तैयारी को दर्शाते हैं। इसके विपरीत विषयवस्तु सीखने की सामग्री है, जो अधिगमकर्ता के बाहर होती है और पाठ्यक्रम द्वारा निर्धारित की जाती है। इसकी कठिनाई, लंबाई तथा अर्थपूर्णता अधिगम को प्रभावित करती है, फिर भी यह व्यक्तिगत कारक नहीं है। अतः विकल्प (2) सही उत्तर है।
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Q35. निम्नलिखित में से कौन-सा चिंतन उपकरण अधिगम को बढ़ावा देता है ? (a) प्रतिमाएँ (b) भाषा (c) संप्रत्यय (d) प्रतिज्ञप्ति — सही कूट का चयन कीजिए :

Right Answer: (a), (b), (c) एवं (d)


Explanation:

चिंतन एक आंतरिक मानसिक प्रक्रिया है जो प्रतीकों के माध्यम से संचालित होती है। इसके प्रमुख उपकरण हैं — प्रतिमाएँ, जो पूर्व अनुभवों का मानसिक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं; भाषा, जो विचारों को शब्दों एवं वाक्यों में व्यक्त कर संप्रेषण योग्य बनाती है; संप्रत्यय, जो समान वस्तुओं अथवा घटनाओं के सामान्य गुणों का सामान्यीकरण है; तथा प्रतिज्ञप्ति, जो दो या अधिक संप्रत्ययों के पारस्परिक संबंध को कथन के रूप में प्रस्तुत करती है। ये चारों उपकरण मिलकर तर्क, समस्या-समाधान एवं अर्थपूर्ण अधिगम को समृद्ध बनाते हैं। अतः सही कूट विकल्प (4) है।
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Q36. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प सृजनशील बालक की सही व्याख्या नहीं करता ?

Right Answer: अभिसारी चिंतन


Explanation:

सृजनात्मकता का मूल आधार अपसारी चिंतन है, जिसमें व्यक्ति एक ही समस्या के अनेक नवीन एवं भिन्न-भिन्न समाधान खोजता है। सृजनशील बालक की प्रमुख विशेषताएँ हैं — मौलिक विचार अर्थात् अनोखे और नवीन विचार प्रस्तुत करना, साहसिक मनोवृत्ति अर्थात् जोखिम उठाकर नए प्रयोग करना, तथा विचार प्रवाहशीलता अर्थात् कम समय में अनेक विचार उत्पन्न करना। इसके विपरीत अभिसारी चिंतन में व्यक्ति अनेक सूचनाओं से केवल एक पूर्वनिर्धारित सही उत्तर तक पहुँचता है, जो परंपरागत परीक्षा-आधारित सोच है। यह सृजनात्मकता की विशेषता नहीं है। अतः विकल्प (4) सही उत्तर है।
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Q37. शिक्षण-अधिगम परिस्थितियों में विद्यार्थियों को दण्ड देना किस प्रकार का अभिप्रेरक है ?

Right Answer: बाह्य


Explanation:

अभिप्रेरकों को मुख्यतः आंतरिक और बाह्य दो वर्गों में बाँटा जाता है। आंतरिक अभिप्रेरणा में कार्य स्वयं आनंददायी होता है, जैसे जिज्ञासा, रुचि अथवा आत्म-संतुष्टि। बाह्य अभिप्रेरणा में व्यक्ति किसी बाहरी परिणाम के कारण कार्य करता है, जैसे पुरस्कार पाना अथवा दण्ड से बचना। दण्ड विद्यालय द्वारा बाहर से लागू किया गया एक ऋणात्मक बाह्य अभिप्रेरक है, जो अस्थायी रूप से व्यवहार बदलता है किन्तु सीखने में स्थायी रुचि उत्पन्न नहीं करता। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षाशास्त्र दण्ड के स्थान पर सकारात्मक प्रोत्साहन पर बल देता है। अतः विकल्प (3) सही है।
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Q38. निम्नलिखित में से कौन-सी गति बाधित विद्यार्थियों की विशिष्ट आवश्यकता नहीं है ?

Right Answer: आश्रित व्यवहार


Explanation:

गति बाधित अर्थात् चलने-फिरने में अक्षम विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना समावेशी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। उनकी वास्तविक आवश्यकताएँ हैं — रैम्प, चौड़े दरवाजे एवं सुलभ शौचालय जैसी ढाँचागत व्यवस्थाएँ, कक्षा एवं खेल गतिविधियों में उपयुक्त अनुकूलन, तथा भविष्य में स्वावलंबी जीविका हेतु व्यावसायिक प्रशिक्षण। इसके विपरीत आश्रित व्यवहार कोई आवश्यकता नहीं, बल्कि एक अवांछनीय प्रवृत्ति है, जिसे शिक्षक को हतोत्साहित करना चाहिए। बच्चे को दूसरों पर निर्भर बनाना उसके आत्मविश्वास एवं स्वतंत्रता को क्षति पहुँचाता है। अतः विकल्प (3) सही उत्तर है।
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Q39. निम्नलिखित लक्षण किस प्रकार की अधिगम कठिनाई को इंगित करते हैं ? (a) अंकों एवं प्रतीकों को लिखने की अक्षमता (b) आधारभूत अंकगणितीय गणना में कठिनाई

Right Answer: डिस्कैल्कुलिया


Explanation:

डिस्कैल्कुलिया एक विशिष्ट अधिगम अक्षमता है जो गणितीय योग्यता से संबंधित है। इससे ग्रस्त बच्चा अंकों एवं गणितीय प्रतीकों को पहचानने और लिखने में कठिनाई अनुभव करता है, संख्याओं का क्रम एवं स्थानीय मान समझ नहीं पाता तथा जोड़, घटाव, गुणा एवं भाग जैसी आधारभूत संक्रियाओं में त्रुटि करता है। यह बुद्धि की कमी नहीं, बल्कि मस्तिष्क की सूचना-संसाधन प्रक्रिया से जुड़ी विशिष्ट कठिनाई है। डिस्प्रैक्सिया गति-समन्वय से संबंधित है, जबकि शेष दो विकल्प मान्य पारिभाषिक शब्द नहीं हैं। अतः विकल्प (1) सही उत्तर है।
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Q40. ‘सीखने का मूल्यांकन’ को इस नाम से भी जाना जाता है :

Right Answer: योगात्मक मूल्यांकन


Explanation:

‘सीखने का मूल्यांकन’ अर्थात् Assessment of Learning वह मूल्यांकन है जो किसी पाठ, सत्र अथवा शैक्षिक अवधि की समाप्ति पर किया जाता है और विद्यार्थी की अंतिम उपलब्धि का निर्णय देता है। इसे ही योगात्मक मूल्यांकन कहते हैं, जिसमें ग्रेड अथवा अंक प्रदान किए जाते हैं। इसके विपरीत ‘सीखने के लिए मूल्यांकन’ अर्थात् रचनात्मक मूल्यांकन शिक्षण के दौरान निरंतर चलता है और प्रतिपुष्टि देकर सुधार में सहायता करता है। निदानात्मक मूल्यांकन कठिनाइयों के कारण खोजता है तथा उपचारात्मक मूल्यांकन उनके निवारण से जुड़ा है। अतः विकल्प (1) सही है।
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Deepak - Educational Content Creator

Written by Deepak

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