Psychology - Sensation, Attention and Perception: 3 MCQs with Answers
Psychology- Sensation, Attention and Perception
संवेदना, ध्यान, प्रत्यक्षीकरण, सीमा (threshold) तथा चयनात्मक ध्यान के सिद्धांतों से संबंधित बहुविकल्पीय प्रश्न।Your Progress
0%Q1. किसी व्यक्ति के लिए उद्दीपक की तीव्रता में अंतर देखने के लिए आवश्यक भौतिक उद्दीपक में परिवर्तन की न्यूनतम मात्रा को कहा जाता है :
Right Answer: अंतर सीमा
अंतर सीमा वह न्यूनतम मात्रा है जितना किसी भौतिक उद्दीपक में परिवर्तन करने पर व्यक्ति उसकी तीव्रता में अन्तर का अनुभव कर सके। इसी परिवर्तन के फलस्वरूप जो अनुभूत अन्तर उत्पन्न होता है उसे ‘बस ध्यान देने योग्य अंतर’ कहते हैं। अर्नेस्ट वेबर ने बताया कि अंतर सीमा उद्दीपक की मूल तीव्रता के समानुपाती होती है; यही वेबर का नियम है। इसीलिए तेज प्रकाश में परिवर्तन पहचानने के लिए बड़ा अन्तर चाहिए, जबकि मन्द प्रकाश में छोटा भी पर्याप्त होता है। निरपेक्ष सीमा इससे भिन्न है और उद्दीपक की न्यूनतम पहचान-योग्य मात्रा बताती है।
Q2. निम्नलिखित चयनात्मक ध्यान के सिद्धांतों को उनके प्रतिपादकों के साथ मिलान कीजिए एवं सही कूट का चयन कीजिए :
सूची-I
A. निस्यंदक सिद्धांत
B. बहुविधिक सिद्धांत
C. निस्यंदक क्षीणन सिद्धांत
D. टैचिस्टोस्कोप
सूची-II
(i) ट्रायसमैन
(ii) ब्रॉडबेन्ट
(iii) ध्यान का विस्तार
(iv) जॉनसन एवं हिन्ज
Right Answer: (A)-(ii), (B)-(iv), (C)-(i), (D)-(iii)
डोनाल्ड ब्रॉडबेन्ट का निस्यंदक सिद्धांत मानता है कि ध्यान एक आरम्भिक छननी की भाँति कार्य करता है, जो केवल चयनित संदेश को आगे भेजती है और शेष को पूरी तरह रोक देती है। ऐनी ट्रायसमैन के निस्यंदक क्षीणन सिद्धांत के अनुसार अनचाहा संदेश पूरी तरह रुकता नहीं, केवल क्षीण होकर आगे बढ़ता है, इसीलिए अपना नाम सुनते ही ध्यान चला जाता है। जॉनसन एवं हिन्ज का बहुविधिक सिद्धांत बताता है कि चयन का बिन्दु स्थिर नहीं, बल्कि कार्य की माँग के अनुसार लचीला होता है। टैचिस्टोस्कोप ध्यान का विस्तार मापने वाला उपकरण है।
Q3. अंजली एक अच्छी पाठक है क्योंकि पढ़ते समय वह सामग्री पर सहजता से आगे बढ़ती जाती है। इससे वह साथियों से तेज पढ़ लेती है, परन्तु यह निश्चित नहीं कि वह सामग्री समझ भी पा रही है। इस प्रतिमान की व्याख्या है :
Right Answer: नेत्रप्लुति गति
पढ़ते समय आँखें पंक्ति पर सतत रूप से नहीं सरकतीं, बल्कि छोटी-छोटी तीव्र छलाँगें लगाती हैं जिन्हें नेत्रप्लुति गति कहा जाता है। दो छलाँगों के बीच आँख लगभग एक चौथाई सेकण्ड के लिए ठहरती है और इसी ठहराव में वास्तविक पठन होता है, क्योंकि छलाँग के दौरान दृष्टि लगभग दबी रहती है। कुशल पाठक की छलाँगें लम्बी और ठहराव कम होते हैं, इसलिए वह तेज पढ़ता है। परन्तु ठहराव कम होने से प्रसंस्करण का समय भी घट जाता है, अतः गति बढ़ने पर समझ की गारंटी नहीं रहती। यही अंजली के प्रकरण की व्याख्या है।