Music: 60 MCQs with Answers
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0%Music MCQ Questions and Answers for HTET Exam
Music MCQ Questions and Answers on Hindustani classical music, ragas, talas, instruments and musicologists। संगीत विषय के महत्त्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न, उत्तर एवं व्याख्या सहित — HTET, DSSSB TGT / PGT Music Teacher Exam, BPSC TRE (Music), Bihar STET (Paper I & II), MP TET Varg 2 & Varg 3 (Vocal/Instrumental/Dance), HTET (Music), HSSC TGT / PGT Music Recruitment, UP TGT / PGT Music UP Secondary Education Service Selection Board (UPSESSB), UGC-NET, KVS, NVS एवं अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के लिए उपयोगी।
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Q41. ध्वनि की तारता का संबंध किससे है ?
Right Answer: नादोत्पादक वस्तु की आवृत्ति से
Explanation:
ध्वनि के तीन प्रमुख अभिलक्षण होते हैं — तारता, तीव्रता तथा गुण। इनमें तारता अर्थात् पिच वह गुण है जिससे हम किसी स्वर को ऊँचा अथवा नीचा अनुभव करते हैं, और वह पूर्णतः नादोत्पादक वस्तु की आवृत्ति पर निर्भर करती है; आवृत्ति जितनी अधिक होगी, स्वर उतना ही ऊँचा सुनाई देगा। इसीलिए तार सप्तक का षड्ज मध्य सप्तक के षड्ज से ठीक दुगुनी आवृत्ति रखता है। इसके विपरीत कम्पन का विस्तार अर्थात् आयाम ध्वनि की तीव्रता निर्धारित करता है, और अधिस्वरकों का अनुपात नाद के गुण को।
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Q42. निम्नलिखित में से ‘गंधार वादी’ रागों का चयन कीजिए :
(i) यमन
(ii) भूपाली
(iii) खमाज
(iv) बिहाग
Right Answer: (i), (ii), (iii), (iv) सभी
Explanation:
वादी वह स्वर है जो राग में सर्वाधिक प्रयुक्त होता है और जिसे राग का जीवस्वर अथवा राजा कहा जाता है। प्रश्न में दिए गए चारों रागों का वादी गंधार ही है। यमन में वादी गंधार तथा संवादी निषाद माना जाता है, भूपाली में वादी गंधार तथा संवादी धैवत, खमाज में वादी गंधार तथा संवादी निषाद, और बिहाग में भी वादी गंधार तथा संवादी निषाद है। यह भी ध्यातव्य है कि यमन, खमाज एवं बिहाग उत्तरांग प्रधान न होकर पूर्वांग वादी राग हैं, क्योंकि गंधार सप्तक के पूर्वार्ध में आता है।
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Q43. संगीत पारिजात में ‘तालाश्रित अलंकारों’ की संख्या कितनी वर्णित है ?
Right Answer: 69
Explanation:
अलंकार स्वरों की वह क्रमबद्ध रचना है जो राग को सुशोभित करती है और अभ्यास का आधार बनती है। प्राचीन ग्रन्थों में इनकी संख्या भिन्न-भिन्न बताई गई है — भरत के नाट्यशास्त्र में तैंतीस, संगीत रत्नाकर में तिरसठ, तथा अहोबल कृत संगीत पारिजात में उनसठ के आगे बढ़कर उनहत्तर तालाश्रित अलंकारों का उल्लेख मिलता है। तालाश्रित अलंकार वे हैं जिनकी रचना में ताल एवं लय का आश्रय लिया जाता है, जबकि वर्णाश्रित अलंकार स्थायी, आरोही, अवरोही तथा संचारी — इन चार वर्णों पर आधारित होते हैं।
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Q44. रूपक ताल के एक आवर्तन में धमार के एक आवर्तन को कहा जाता है :
Right Answer: धमार की दुगुन
Explanation:
धमार ताल चौदह मात्राओं का है और रूपक ताल सात मात्राओं का। जब धमार के एक पूरे आवर्तन को रूपक के एक ही आवर्तन में समाहित करना हो, तो चौदह मात्राओं की सामग्री सात मात्राओं में समेटनी पड़ेगी, अर्थात् प्रत्येक बोल आधे समय में बजाना होगा। यह ठीक दुगुनी गति है, इसीलिए इसे धमार की दुगुन कहा जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि लयकारी का नाम सदैव उस रचना के सन्दर्भ में रखा जाता है जिसे विस्तारित या संकुचित किया जा रहा है, न कि उस ताल के सन्दर्भ में जिसमें वह बजाई जा रही है।
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Q45. कथन (A) : दशविध राग वर्गीकरण में कुल 96 भाषा रागों का उल्लेख है। कथन (B) : ‘पूर्व प्रसिद्ध’ 11 तथा ‘अधुना प्रसिद्ध’ 9, कुल 20 भाषांग राग वर्णित हैं। सही विकल्प चुनिए :
Right Answer: (A) तथा (B) दोनों सत्य हैं।
Explanation:
दोनों कथन सत्य हैं। शार्ङ्गदेव ने संगीत रत्नाकर में रागों का दशविध वर्गीकरण किया, जिसमें ग्रामराग, उपराग, राग, भाषा, विभाषा, अन्तर्भाषा, रागांग, भाषांग, क्रियांग तथा उपांग सम्मिलित हैं। इनमें भाषा रागों की कुल संख्या छियानवे बताई गई है, जो ग्रामरागों से उत्पन्न देशी रागों का सबसे बड़ा वर्ग है। भाषांग रागों को दो भागों में रखा गया है — पूर्व प्रसिद्ध ग्यारह तथा अधुना प्रसिद्ध नौ, अर्थात् कुल बीस। यह वर्गीकरण मार्गी परम्परा से देशी परम्परा की ओर संक्रमण का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
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Q46. सितार वादन में मींड, घसीट, तोड़ा एवं झाला वादन का आरंभ किसने किया ?
Right Answer: इमदाद खाँ
Explanation:
उस्ताद इमदाद खाँ इटावा अथवा इमदादखानी घराने के प्रवर्तक थे और उन्हीं ने सितार तथा सुरबहार पर मींड, घसीट, तोड़ा एवं झाला के व्यवस्थित वादन का आरम्भ किया। मींड में एक स्वर से दूसरे स्वर तक तार खींचकर अविच्छिन्न सरकाव लाया जाता है, घसीट में उँगली को परदों पर सरकाकर स्वर जोड़े जाते हैं, तोड़ा द्रुत स्वर-समूहों की रचना है और झाला चिकारी के आघातों से बनने वाला अन्तिम तीव्र भाग। इन्हीं प्रयोगों से सितार पर गायकी अंग का मार्ग खुला, जिसे आगे उनके पुत्र इनायत खाँ तथा पौत्र विलायत खाँ ने चरम पर पहुँचाया।
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Q47. संगीत रत्नाकर में वर्णित ‘प्रबंधों’ की संख्या के अनुसार (शुद्ध सूड – सालग सूड – आलि – विप्रकीर्ण) कौन-सा विकल्प सही है ?
Right Answer: 8 – 7 – 24 – 36
Explanation:
प्रबंध मध्यकालीन भारतीय संगीत की निबद्ध गान-रचना थी, जिसका विस्तृत विवेचन शार्ङ्गदेव ने संगीत रत्नाकर के प्रबन्धाध्याय में किया। उन्होंने प्रबंधों को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा — सूड, आलि तथा विप्रकीर्ण। सूड पुनः शुद्ध सूड एवं सालग सूड में विभक्त है, जिनमें क्रमशः आठ तथा सात प्रबंध आते हैं; सालग सूड के सात प्रबंधों में ध्रुव, मंठ, प्रतिमंठ, निःसारुक, अड्डताल, रासक तथा एकताली सम्मिलित हैं। आलि वर्ग में चौबीस और विप्रकीर्ण वर्ग में छत्तीस प्रबंध वर्णित हैं। इन्हीं में से आगे चलकर ध्रुपद का विकास हुआ।
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Q48. गुरु - शिष्य की सही जोड़ी का चयन कीजिए : गुरु शिष्य
Right Answer: विलायत खाँ – अरविंद पारीख
Explanation:
पण्डित अरविंद पारीख उस्ताद विलायत खाँ के वरिष्ठतम एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध शिष्य रहे। उन्होंने इटावा घराने की गायकी अंग वाली सितार परम्परा को न केवल आत्मसात किया, बल्कि व्यवसाय के साथ-साथ संगीत को समर्पित रहते हुए अध्यापन, अभिलेखन तथा संगीत-संस्थाओं के माध्यम से उसका व्यापक प्रसार भी किया। शेष जोड़ियाँ गलत हैं — बलराम पाठक विलायत खाँ की परम्परा से जुड़े रहे, देबू चौधरी मुश्ताक अली खाँ के शिष्य थे, और निखिल बनर्जी बाबा अल्लाउद्दीन खाँ तथा अन्नपूर्णा देवी के शिष्य रहे, गजानन राव जोशी के गुरु नहीं।
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Q49. संगीत रत्नाकर के प्रकीर्णकाध्याय की विषयवस्तु का चयन कीजिए :
(i) वाग्गेयकार लक्षण
(ii) गायक के गुण-दोष
(iii) गमक के 15 प्रकार
(iv) नाद के 5 भेद
Right Answer: केवल (i), (ii), (iii)
Explanation:
संगीत रत्नाकर का तीसरा अध्याय प्रकीर्णकाध्याय कहलाता है और इसमें वे विषय संगृहीत हैं जो अन्य अध्यायों के अन्तर्गत नहीं आते। इसमें वाग्गेयकार अर्थात् जो स्वयं शब्द रचकर उसे स्वरबद्ध भी करे, उसके लक्षण दिए गए हैं; गायक तथा गायिका के गुण एवं दोषों की विस्तृत सूची है; और गमक के पन्द्रह प्रकार — तिरिप, स्फुरित, कम्पित, लीन, आन्दोलित, वली, त्रिभिन्न, कुरुल, आहत, उल्लासित, प्लावित, हुम्फित, मुद्रित, नामित तथा मिश्रित — गिनाए गए हैं। इसके विपरीत नाद के पाँच भेद प्रथम स्वरगताध्याय में वर्णित हैं।
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Q50. जिन वाद्यों के परदे खिसकाये नहीं जा सकते, वे क्या कहलाते हैं ?
Right Answer: अचल थाट
Explanation:
तंत्री वाद्यों को परदों की गतिशीलता के आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है। जिन वाद्यों के परदे स्थिर रहते हैं और उन्हें खिसकाकर स्वर बदला नहीं जा सकता, वे अचल थाट वाले कहलाते हैं; इनमें राग बदलने पर परदों की स्थिति वैसी ही रहती है और वादक को अलग तकनीक से स्वर निकालना पड़ता है। तानपूरा, सरोद तथा सारंगी जैसे वाद्य इससे भिन्न हैं। इसके विपरीत सितार, वीणा तथा सुरबहार जैसे वाद्यों के परदे तार से बँधे होकर खिसकाए जा सकते हैं, अतः वे चल थाट वाले वाद्य कहलाते हैं और उन्हें राग के अनुसार समायोजित किया जाता है।
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