Music - Musical Instruments and Techniques: 15 MCQs with Answers
Music- Musical Instruments and Techniques
सितार, तबला, पखावज, सारंगी, वायलिन तथा वाद्य वर्गीकरण एवं वादन तकनीकों पर बहुविकल्पीय प्रश्न।Your Progress
0%Q1. सितार पर झाला वादन में ‘रा रा रा’ बोल किस तार पर बजाये जाते हैं ?
Right Answer: चिकारी का तार
सितार वादन में झाला वह अंतिम एवं सर्वाधिक द्रुत भाग है जिसमें बाज के तार पर मुख्य स्वर बजाते हुए बीच-बीच में चिकारी के तारों पर तीव्र आघात किए जाते हैं। ‘रा रा रा’ के बोल इन्हीं चिकारी के तारों पर बजाए जाते हैं और इनसे लयात्मक गति एवं गूँज उत्पन्न होती है। चिकारी सामान्यतः दो पतले तार होते हैं, जो तार सप्तक के षड्ज तथा पंचम में मिलाए जाते हैं और जिन्हें मिजराब से नीचे से ऊपर की ओर खींचकर बजाया जाता है। बाज का तार मुख्य राग-विस्तार के लिए तथा खरज एवं जोड़ी के तार आधार-स्वर के लिए होते हैं।
Q2. प्राचीन ‘त्रिपुष्कर’ के ‘आलिंग्य’ की आकृति किसके समान बताई गई है ?
Right Answer: हरीतकी
प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित त्रिपुष्कर तीन अवनद्ध वाद्यों का समूह था — आंकिक, ऊर्ध्वक तथा आलिंग्य — जिन्हें वादक अपने चारों ओर रखकर एक साथ बजाता था। भरत के नाट्यशास्त्र में इनकी आकृतियों की उपमाएँ दी गई हैं। आंकिक की आकृति गोपुच्छ अर्थात् गाय की पूँछ जैसी, ऊर्ध्वक की यवाकृति अर्थात् जौ के दाने जैसी और आलिंग्य की हरीतकी अर्थात् हरड़ के फल जैसी बताई गई है। इन तीनों को मिलाकर बजाने से मृदंग परम्परा का विकास हुआ, जिसे आगे चलकर पखावज एवं तबले ने आगे बढ़ाया।
Q3. दिल्ली बाज की विशेषताओं का चयन कीजिए :
(i) किनार का बाज
(ii) ‘धाति धागे नधा धिन’ बोल का प्रयोग
(iii) पेशकार का वादन
(iv) आड़ या तिगुन लय प्रधान
Right Answer: केवल (i), (ii), (iii)
दिल्ली घराना तबले का प्राचीनतम घराना माना जाता है, जिसकी स्थापना सिद्धार खाँ ने की। इसकी प्रमुख विशेषता किनार का बाज है, जिसमें दाहिने के किनारे पर दो उँगलियों से नाजुक एवं स्पष्ट बोल निकाले जाते हैं। इसी घराने में ‘धाति धागे नधा धिन’ जैसे बन्द बोलों का विशेष प्रयोग होता है और पेशकार के वादन की परम्परा भी यहीं से आरम्भ हुई। आड़ अथवा तिगुन लय की प्रधानता दिल्ली की नहीं, बल्कि अजराड़ा घराने की विशेषता मानी जाती है, जिसने दिल्ली से निकलकर लयकारी पर विशेष बल दिया।
Q4. वायलिन के तारों को मिलाने की प्रचलित विधियों का चयन कीजिए :
(i) म़ सा प सां
(ii) म़ सा प रें
(iii) प़ सा प सां
(iv) सा़ प सा प
Right Answer: सभी (i), (ii), (iii), (iv)
भारतीय संगीत में वायलिन को पाश्चात्य स्वर-मेल के स्थान पर राग की आवश्यकता के अनुसार मिलाया जाता है और इसके लिए कई प्रचलित पद्धतियाँ हैं। चारों तारों को मन्द्र मध्यम, मध्य षड्ज, मध्य पंचम तथा तार षड्ज में मिलाना अत्यन्त सामान्य है; कुछ वादक चौथे तार को तार ऋषभ में मिलाते हैं ताकि ऊँचे स्वरों का विस्तार सुगम हो। मन्द्र पंचम से आरम्भ करने वाली तथा मन्द्र षड्ज, पंचम, षड्ज, पंचम के क्रम वाली पद्धतियाँ भी कर्नाटक एवं हिन्दुस्तानी दोनों परम्पराओं में प्रयोग में हैं। अतः चारों विधियाँ प्रचलित मानी जाती हैं।
Q5. ‘त्रिपुष्कर’ वाद्य को स्वर में मिलाने की विधि क्या कहलाती है ?
Right Answer: मार्जना
प्राचीन अवनद्ध वाद्यों को वांछित स्वर में मिलाने की प्रक्रिया मार्जना कहलाती थी। इसमें चावल के आटे, जौ तथा जल से बना विशेष लेप वाद्य के चर्ममुख पर लगाया जाता था, जिससे उसकी तनाव-स्थिति बदलकर अभीष्ट स्वर उत्पन्न होता था और नाद में गूँज एवं मधुरता आ जाती थी। नाट्यशास्त्र तथा संगीत रत्नाकर दोनों में त्रिपुष्कर के सन्दर्भ में इस विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है। यही परम्परा आगे चलकर पखावज पर गीली आटे की लोई तथा तबले पर स्थायी स्याही लगाने के रूप में विकसित हुई। सारणा तत वाद्यों से सम्बन्धित प्रक्रिया है।
Q6. कथन (A) : तार को कंपित करने के तरीके में बदलाव से स्वर का गुण बदल जाता है। कथन (B) : तार को छेड़ने के स्थान को बदलने से स्वर का गुण भी बदल जाता है। सही विकल्प चुनिए :
Right Answer: (A) तथा (B) दोनों सत्य हैं।
दोनों कथन सत्य हैं और दोनों ध्वनि विज्ञान के एक ही सिद्धांत से निकलते हैं। किसी तार में मूल स्वर के साथ अनेक अधिस्वरक भी उत्पन्न होते हैं, और स्वर का गुण अर्थात् नाद-सौन्दर्य इन अधिस्वरकों की सापेक्ष तीव्रता से निर्धारित होता है। तार को मिजराब से छेड़ा जाए, गज से घिसा जाए अथवा उँगली से खींचा जाए — प्रत्येक विधि में अधिस्वरकों का अनुपात भिन्न रहता है। इसी प्रकार तार को घुड़च के पास छेड़ने पर उच्च अधिस्वरक प्रबल होकर नाद तीखा हो जाता है, जबकि मध्य में छेड़ने पर वह कोमल एवं गोल लगता है।
Q7. तंत्री वाद्यों में तार पर आघात हेतु प्रयुक्त सामग्री के सही शब्द समूह का चयन कीजिए :
Right Answer: नखी, कोण, जवा, गज, मिजराब
तंत्री अर्थात् तत वाद्यों में तार पर आघात करने अथवा उसे कम्पित करने के लिए विभिन्न साधन प्रयुक्त होते हैं। नखी वह नाखून जैसी युक्ति है जो उँगली में पहनी जाती है, कोण अथवा प्लेक्ट्रम से तार को छेड़ा जाता है, जवा वीणा वादन में प्रयुक्त तार का छल्ला है, गज सारंगी एवं वायलिन जैसे वितत वाद्यों पर घिसा जाता है, और मिजराब सितार तथा सरोद वादन में तर्जनी में पहना जाने वाला तार का बना उपकरण है। शेष विकल्पों में दिए गए शब्द वाद्य के भागों, अवनद्ध वाद्यों की सामग्री अथवा प्राचीन तालवाद्य-प्रक्रियाओं से सम्बन्धित हैं।
Q8. सारंगी का निचला हिस्सा जो खाल से मढ़ा रहता है, कहलाता है :
Right Answer: मगज
सारंगी एक ही लकड़ी के टुकड़े से तराशा गया वितत वाद्य है, जिसे गज से बजाया जाता है और जिसे मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट माना जाता है। इसके शरीर के तीन भाग होते हैं, और सबसे निचला भाग खोखली गुहा के रूप में होता है जिस पर बकरी की महीन खाल मढ़ी रहती है; इसी पर हाथी दाँत अथवा हड्डी की घुड़च टिकी होती है, जो तारों का कम्पन खाल तक पहुँचाकर नाद को गुँजा देती है। ऊपर की ओर लगभग पैंतीस से चालीस तरब के तार लगे रहते हैं, जो सहानुभूति कम्पन से वाद्य को गूँज देते हैं।
Q9. सितार में 8 मुख्य तार तथा ‘बन्द जवारी’ का प्रयोग किस सितार वादक की विशेषता है ?
Right Answer: विलायत खाँ
उस्ताद विलायत खाँ ने सितार की परम्परागत संरचना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए, जिससे जो वाद्य बना उसे विलायतखानी सितार कहा जाता है। उन्होंने खरज तथा पंचम के भारी तार हटाकर मुख्य तारों की संख्या घटाई एवं पुनर्व्यवस्थित की, तरब के तार बढ़ाए और जवारी को अपेक्षाकृत बन्द रखा, जिससे नाद की तीखी झनझनाहट कम होकर स्वर गोल, गहरा और मानव कण्ठ के निकट हो गया। यह परिवर्तन उनकी गायकी अंग की शैली के अनुकूल था, जिसमें लम्बी मींड तथा बोल-अंग की प्रधानता रहती है। इसके विपरीत रविशंकर की सितार खुली जवारी एवं अधिक तारों वाली रही।
Q10. ध्वनि की तारता का संबंध किससे है ?
Right Answer: नादोत्पादक वस्तु की आवृत्ति से
ध्वनि के तीन प्रमुख अभिलक्षण होते हैं — तारता, तीव्रता तथा गुण। इनमें तारता अर्थात् पिच वह गुण है जिससे हम किसी स्वर को ऊँचा अथवा नीचा अनुभव करते हैं, और वह पूर्णतः नादोत्पादक वस्तु की आवृत्ति पर निर्भर करती है; आवृत्ति जितनी अधिक होगी, स्वर उतना ही ऊँचा सुनाई देगा। इसीलिए तार सप्तक का षड्ज मध्य सप्तक के षड्ज से ठीक दुगुनी आवृत्ति रखता है। इसके विपरीत कम्पन का विस्तार अर्थात् आयाम ध्वनि की तीव्रता निर्धारित करता है, और अधिस्वरकों का अनुपात नाद के गुण को।