Music - Music Texts and Theory: 7 MCQs with Answers
Music- Music Texts and Theory
नाट्यशास्त्र, बृहद्देशी, संगीत रत्नाकर, संगीत पारिजात तथा संगीत के ध्वनि-सिद्धांत पर बहुविकल्पीय प्रश्न।Your Progress
0%Q1. संगीत रत्नाकर में ‘वादक’ के गुण - दोष का उल्लेख किस अध्याय में वर्णित है ?
Right Answer: वाद्याध्याय
शार्ङ्गदेव रचित संगीत रत्नाकर सात अध्यायों में विभक्त है, जिन्हें सप्ताध्यायी कहा जाता है — स्वरगताध्याय, रागविवेकाध्याय, प्रकीर्णकाध्याय, प्रबन्धाध्याय, तालाध्याय, वाद्याध्याय तथा नर्तनाध्याय। इनमें छठा वाद्याध्याय वाद्यों से सम्बन्धित है, जिसमें तत, अवनद्ध, घन एवं सुषिर चारों वर्गों के वाद्यों का विस्तृत वर्णन है और वादक के गुण-दोष भी वहीं गिनाए गए हैं। इसके विपरीत गायक के गुण-दोष तथा वाग्गेयकार के लक्षण तीसरे प्रकीर्णकाध्याय में आते हैं, और ताल का विवेचन पाँचवें तालाध्याय में। शार्ङ्गदेव तेरहवीं शताब्दी में देवगिरि के यादव नरेश सिंघण के दरबार में थे।
Q2. भरत द्वारा प्रयुक्त श्रुति तथा स्वर स्थापना की विधि कौन - सी है ?
Right Answer: सारणा
भरत ने नाट्यशास्त्र में श्रुति एवं स्वर के स्थान निर्धारित करने के लिए दो वीणाओं का प्रयोग कर जो प्रयोग किया, उसे सारणा चतुष्टयी कहा जाता है। इसमें ध्रुवा तथा चला नामक दो समान वीणाएँ षड्ज ग्राम में मिलाई जाती हैं; फिर चला वीणा के स्वरों को क्रमशः एक-एक श्रुति नीचे उतारा जाता है और चार बार ऐसा करने पर उसके स्वर पुनः ध्रुवा वीणा के स्वरों से मिल जाते हैं। इसी से यह सिद्ध हुआ कि सप्तक में बाईस श्रुतियाँ हैं और स्वरों में क्रमशः चार, तीन, दो, चार, चार, तीन तथा दो श्रुतियाँ बँटी हैं।
Q3. निम्नलिखित ग्रन्थों का सही रचनाकाल क्रम दर्शाने वाला विकल्प चुनिए :
(i) संगीत मकरंद
(ii) बृहद्देशी
(iii) संगीत पारिजात
(iv) श्रीमल्लक्ष्यसंगीतम्
Right Answer: (ii) (i) (iii) (iv)
इन चारों ग्रन्थों का सही कालक्रम इस प्रकार है। मतंग रचित ‘बृहद्देशी’ लगभग आठवीं शताब्दी की कृति है और इसी में सर्वप्रथम ‘राग’ शब्द की परिभाषा दी गई। नारद रचित ‘संगीत मकरंद’ लगभग ग्यारहवीं शताब्दी का है, जिसमें रागों का पुल्लिंग-स्त्रीलिंग वर्गीकरण तथा राग-समय सिद्धांत मिलता है। अहोबल रचित ‘संगीत पारिजात’ सत्रहवीं शताब्दी की रचना है, जिसमें स्वरों का स्थान वीणा की तार-लम्बाई से निर्धारित किया गया। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘श्रीमल्लक्ष्यसंगीतम्’ बीसवीं शताब्दी की आधुनिक कृति है।
Q4. संगीत पारिजात में ‘तालाश्रित अलंकारों’ की संख्या कितनी वर्णित है ?
Right Answer: 69
अलंकार स्वरों की वह क्रमबद्ध रचना है जो राग को सुशोभित करती है और अभ्यास का आधार बनती है। प्राचीन ग्रन्थों में इनकी संख्या भिन्न-भिन्न बताई गई है — भरत के नाट्यशास्त्र में तैंतीस, संगीत रत्नाकर में तिरसठ, तथा अहोबल कृत संगीत पारिजात में उनसठ के आगे बढ़कर उनहत्तर तालाश्रित अलंकारों का उल्लेख मिलता है। तालाश्रित अलंकार वे हैं जिनकी रचना में ताल एवं लय का आश्रय लिया जाता है, जबकि वर्णाश्रित अलंकार स्थायी, आरोही, अवरोही तथा संचारी — इन चार वर्णों पर आधारित होते हैं।
Q5. संगीत रत्नाकर में वर्णित ‘प्रबंधों’ की संख्या के अनुसार (शुद्ध सूड – सालग सूड – आलि – विप्रकीर्ण) कौन-सा विकल्प सही है ?
Right Answer: 8 – 7 – 24 – 36
प्रबंध मध्यकालीन भारतीय संगीत की निबद्ध गान-रचना थी, जिसका विस्तृत विवेचन शार्ङ्गदेव ने संगीत रत्नाकर के प्रबन्धाध्याय में किया। उन्होंने प्रबंधों को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा — सूड, आलि तथा विप्रकीर्ण। सूड पुनः शुद्ध सूड एवं सालग सूड में विभक्त है, जिनमें क्रमशः आठ तथा सात प्रबंध आते हैं; सालग सूड के सात प्रबंधों में ध्रुव, मंठ, प्रतिमंठ, निःसारुक, अड्डताल, रासक तथा एकताली सम्मिलित हैं। आलि वर्ग में चौबीस और विप्रकीर्ण वर्ग में छत्तीस प्रबंध वर्णित हैं। इन्हीं में से आगे चलकर ध्रुपद का विकास हुआ।
Q6. संगीत रत्नाकर के प्रकीर्णकाध्याय की विषयवस्तु का चयन कीजिए :
(i) वाग्गेयकार लक्षण
(ii) गायक के गुण-दोष
(iii) गमक के 15 प्रकार
(iv) नाद के 5 भेद
Right Answer: केवल (i), (ii), (iii)
संगीत रत्नाकर का तीसरा अध्याय प्रकीर्णकाध्याय कहलाता है और इसमें वे विषय संगृहीत हैं जो अन्य अध्यायों के अन्तर्गत नहीं आते। इसमें वाग्गेयकार अर्थात् जो स्वयं शब्द रचकर उसे स्वरबद्ध भी करे, उसके लक्षण दिए गए हैं; गायक तथा गायिका के गुण एवं दोषों की विस्तृत सूची है; और गमक के पन्द्रह प्रकार — तिरिप, स्फुरित, कम्पित, लीन, आन्दोलित, वली, त्रिभिन्न, कुरुल, आहत, उल्लासित, प्लावित, हुम्फित, मुद्रित, नामित तथा मिश्रित — गिनाए गए हैं। इसके विपरीत नाद के पाँच भेद प्रथम स्वरगताध्याय में वर्णित हैं।
Q7. नाट्यशास्त्र में वर्णित तथ्यों में कौन - सा कथन सत्य है ?
Right Answer: 33 संचारी भाव वर्णित हैं।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में रस-निष्पत्ति का प्रसिद्ध सूत्र है कि विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है। इन्हीं व्यभिचारी भावों को संचारी भाव कहा जाता है, क्योंकि वे स्थायी भाव के साथ आते-जाते रहते हैं, और उनकी संख्या तैंतीस बताई गई है, जिनमें निर्वेद, ग्लानि, शंका, श्रम, मद, चिन्ता, हर्ष, गर्व, उग्रता तथा उन्माद जैसे भाव आते हैं। शेष कथन असत्य हैं — प्रावेशिकी एवं नैष्क्रामिकी ध्रुवाओं के प्रकार हैं, जातियाँ अठारह अवश्य हैं किन्तु वे भिन्न हैं, तथा नाट्यशास्त्र में अलंकार तैंतीस गिनाए गए हैं।