Music: 60 MCQs with Answers
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0%Music MCQ Questions and Answers for HTET Exam
Music MCQ Questions and Answers on Hindustani classical music, ragas, talas, instruments and musicologists। संगीत विषय के महत्त्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न, उत्तर एवं व्याख्या सहित — HTET, DSSSB TGT / PGT Music Teacher Exam, BPSC TRE (Music), Bihar STET (Paper I & II), MP TET Varg 2 & Varg 3 (Vocal/Instrumental/Dance), HTET (Music), HSSC TGT / PGT Music Recruitment, UP TGT / PGT Music UP Secondary Education Service Selection Board (UPSESSB), UGC-NET, KVS, NVS एवं अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के लिए उपयोगी।
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Q1. सितार पर झाला वादन में ‘रा रा रा’ बोल किस तार पर बजाये जाते हैं ?
Right Answer: चिकारी का तार
Explanation:
सितार वादन में झाला वह अंतिम एवं सर्वाधिक द्रुत भाग है जिसमें बाज के तार पर मुख्य स्वर बजाते हुए बीच-बीच में चिकारी के तारों पर तीव्र आघात किए जाते हैं। ‘रा रा रा’ के बोल इन्हीं चिकारी के तारों पर बजाए जाते हैं और इनसे लयात्मक गति एवं गूँज उत्पन्न होती है। चिकारी सामान्यतः दो पतले तार होते हैं, जो तार सप्तक के षड्ज तथा पंचम में मिलाए जाते हैं और जिन्हें मिजराब से नीचे से ऊपर की ओर खींचकर बजाया जाता है। बाज का तार मुख्य राग-विस्तार के लिए तथा खरज एवं जोड़ी के तार आधार-स्वर के लिए होते हैं।
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Q2. निम्नलिखित में कौन-सा विकल्प (ताल – चिन्ह – मात्रा) सुमेलित नहीं है ?
Right Answer: मिश्र जाति झपताल – 100 – 13 मात्रा
Explanation:
कर्नाटक ताल पद्धति में प्रत्येक ताल लघु, द्रुत तथा अनुद्रुत के संयोजन से बनता है, जिनमें लघु की मात्रा जाति पर निर्भर करती है, द्रुत सदैव दो तथा अनुद्रुत सदैव एक मात्रा का होता है। तिस्र जाति ध्रुव में 3+2+3+3 अर्थात् 11, चतुरश्र जाति मठ में 4+2+4 अर्थात् 10 तथा खंड जाति अठ में 5+5+2+2 अर्थात् 14 मात्राएँ होती हैं। झप ताल लघु, अनुद्रुत तथा द्रुत से बनता है, अतः मिश्र जाति में उसकी मात्राएँ 7+1+2 अर्थात् 10 होंगी, 13 नहीं। यही युग्म असुमेलित है।
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Q3. प्राचीन ‘त्रिपुष्कर’ के ‘आलिंग्य’ की आकृति किसके समान बताई गई है ?
Right Answer: हरीतकी
Explanation:
प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित त्रिपुष्कर तीन अवनद्ध वाद्यों का समूह था — आंकिक, ऊर्ध्वक तथा आलिंग्य — जिन्हें वादक अपने चारों ओर रखकर एक साथ बजाता था। भरत के नाट्यशास्त्र में इनकी आकृतियों की उपमाएँ दी गई हैं। आंकिक की आकृति गोपुच्छ अर्थात् गाय की पूँछ जैसी, ऊर्ध्वक की यवाकृति अर्थात् जौ के दाने जैसी और आलिंग्य की हरीतकी अर्थात् हरड़ के फल जैसी बताई गई है। इन तीनों को मिलाकर बजाने से मृदंग परम्परा का विकास हुआ, जिसे आगे चलकर पखावज एवं तबले ने आगे बढ़ाया।
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Q4. दिल्ली बाज की विशेषताओं का चयन कीजिए :
(i) किनार का बाज
(ii) ‘धाति धागे नधा धिन’ बोल का प्रयोग
(iii) पेशकार का वादन
(iv) आड़ या तिगुन लय प्रधान
Right Answer: केवल (i), (ii), (iii)
Explanation:
दिल्ली घराना तबले का प्राचीनतम घराना माना जाता है, जिसकी स्थापना सिद्धार खाँ ने की। इसकी प्रमुख विशेषता किनार का बाज है, जिसमें दाहिने के किनारे पर दो उँगलियों से नाजुक एवं स्पष्ट बोल निकाले जाते हैं। इसी घराने में ‘धाति धागे नधा धिन’ जैसे बन्द बोलों का विशेष प्रयोग होता है और पेशकार के वादन की परम्परा भी यहीं से आरम्भ हुई। आड़ अथवा तिगुन लय की प्रधानता दिल्ली की नहीं, बल्कि अजराड़ा घराने की विशेषता मानी जाती है, जिसने दिल्ली से निकलकर लयकारी पर विशेष बल दिया।
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Q5. आदि - विलंबित, बीच में – मध्य, अन्त में – दु्रतलय, किस यति को दर्शाता है ?
Right Answer: गोपुच्छा
Explanation:
यति से तात्पर्य किसी रचना में लय के क्रमिक विस्तार अथवा संकोच से है और भारतीय संगीत में इसके छह प्रकार माने गए हैं। जब रचना का आरम्भ विलम्बित लय से हो, मध्य में मध्य लय आए और अन्त में द्रुत लय हो जाए, तो वह गोपुच्छा यति कहलाती है, क्योंकि गाय की पूँछ भी ऊपर से मोटी और नीचे जाकर पतली होती जाती है। इसके विपरीत स्रोतोगता यति में क्रम उल्टा रहता है, अर्थात् द्रुत से विलम्बित की ओर; समा यति में लय आद्यन्त समान रहती है; और मृदंगा यति में दोनों सिरे संकीर्ण तथा मध्य विस्तृत रहता है।
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Q6. संगीत रत्नाकर में ‘वादक’ के गुण - दोष का उल्लेख किस अध्याय में वर्णित है ?
Right Answer: वाद्याध्याय
Explanation:
शार्ङ्गदेव रचित संगीत रत्नाकर सात अध्यायों में विभक्त है, जिन्हें सप्ताध्यायी कहा जाता है — स्वरगताध्याय, रागविवेकाध्याय, प्रकीर्णकाध्याय, प्रबन्धाध्याय, तालाध्याय, वाद्याध्याय तथा नर्तनाध्याय। इनमें छठा वाद्याध्याय वाद्यों से सम्बन्धित है, जिसमें तत, अवनद्ध, घन एवं सुषिर चारों वर्गों के वाद्यों का विस्तृत वर्णन है और वादक के गुण-दोष भी वहीं गिनाए गए हैं। इसके विपरीत गायक के गुण-दोष तथा वाग्गेयकार के लक्षण तीसरे प्रकीर्णकाध्याय में आते हैं, और ताल का विवेचन पाँचवें तालाध्याय में। शार्ङ्गदेव तेरहवीं शताब्दी में देवगिरि के यादव नरेश सिंघण के दरबार में थे।
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Q7. पं० किशन महाराज को किस वर्ष ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया ?
Right Answer: 2002
Explanation:
पण्डित किशन महाराज बनारस घराने के विश्वविख्यात तबला वादक थे, जिनका जन्म 1923 में वाराणसी में हुआ और जिन्होंने अपने पिता हरि महाराज तथा चाचा कण्ठे महाराज से शिक्षा प्राप्त की। उन्हें 1973 में पद्मश्री और 2002 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वे अपनी अद्भुत लयकारी, चक्रदार परनों तथा गायन एवं नृत्य दोनों के साथ संगत की असाधारण क्षमता के लिए प्रसिद्ध रहे। उन्होंने बनारस बाज की खुली एवं गूँजदार शैली को अन्तर्राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया। 2008 में उनका निधन हुआ।
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Q8. अन्नपूर्णा देवी शिष्य थीं :
Right Answer: अल्लाउद्दीन खाँ की
Explanation:
अन्नपूर्णा देवी बाबा अल्लाउद्दीन खाँ की पुत्री एवं शिष्या थीं और उन्होंने मैहर-सेनिया घराने की सम्पूर्ण परम्परा अपने पिता से ही प्राप्त की। वे सुरबहार की असाधारण वादिका थीं, जिनके वादन में ध्रुपद अंग की गम्भीरता एवं आलाप का विस्तृत विवेचन मिलता था। उनका विवाह पण्डित रविशंकर से हुआ था। उन्होंने बहुत पहले ही सार्वजनिक मंच से स्वयं को हटा लिया और शेष जीवन अध्यापन को समर्पित किया; हरिप्रसाद चौरसिया, निखिल बनर्जी तथा नित्यानन्द हल्दीपुर उनके प्रमुख शिष्य रहे।
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Q9. विभाग चिन्हों के आधार पर सूलताल का चयन करें :
Right Answer: × 0 2 3 0
Explanation:
सूलताल दस मात्राओं का ताल है, जो मुख्यतः ध्रुपद एवं धमार गायन तथा पखावज वादन में प्रयुक्त होता है। इसमें पाँच विभाग होते हैं और प्रत्येक विभाग दो-दो मात्राओं का रहता है। इसके विभाग चिन्ह क्रमशः सम, खाली, दूसरी ताली, तीसरी ताली तथा खाली हैं, अर्थात् × 0 2 3 0। इसका ठेका ‘धा धा दिन ता, किट धा, तिरकिट, धिन ना, किट तक, गदि घेन’ के रूप में बजाया जाता है। दस मात्रा होते हुए भी इसका विभाजन झपताल से पूर्णतः भिन्न है, क्योंकि झपताल में विभाग 2-3-2-3 के क्रम में आते हैं।
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Q10. एकताल के एक आवर्तन की ‘तिगुन’ तथा ‘आड़’ को किस ताल के एक पूर्ण आवर्तन में किया जा सकेगा ?
Right Answer: चौताल
Explanation:
एकताल बारह मात्राओं का ताल है और चौताल भी बारह मात्राओं का ही होता है, यद्यपि दोनों के विभाग एवं ठेके भिन्न हैं। किसी लयकारी को पूर्ण आवर्तन में समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि उसकी मात्रा संख्या लक्ष्य ताल की मात्रा संख्या के अनुरूप हो। एकताल के एक आवर्तन की तिगुन तथा आड़ लयकारी बारह मात्राओं के विस्तार पर ही आधारित रहती है, अतः वह चौताल के एक पूर्ण आवर्तन में सम पर आकर समाप्त हो जाएगी। तिलवाड़ा सोलह, रूपक सात तथा झपताल दस मात्राओं का होने से वहाँ सम नहीं मिलेगा।
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