Fine Art: 60 MCQs with Answers
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0%Q11. नई दिल्ली के निर्माण भवन में त्रि - आयामी मोजे़क - कंक्रीट भित्ति चित्र किसने बनाया ?
Right Answer: शंखू चौधरी
नई दिल्ली के निर्माण भवन में त्रि-आयामी मोजे़क एवं कंक्रीट का भित्ति चित्र प्रसिद्ध मूर्तिकार शंखो चौधरी ने बनाया। वे शान्तिनिकेतन में रामकिंकर बैज के शिष्य रहे और आगे चलकर बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में मूर्तिकला विभाग के संस्थापक अध्यक्ष बने। उन्होंने पत्थर, धातु, लकड़ी तथा कंक्रीट सभी माध्यमों में कार्य किया और सार्वजनिक स्थलों के लिए अनेक विशाल भित्ति एवं मुक्त-खड़ी मूर्तियाँ बनाईं। उन्हें पद्मश्री तथा ललित कला अकादमी की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
Q12. सूची-I का सूची-II से मिलान कीजिए :
सूची-I
(a) लिथोग्राफी
(b) एचिंग
(c) रिलीफ
(d) सेरोग्राफी
सूची-II
(i) लकड़ी का ब्लॉक
(ii) पत्थर
(iii) सिल्क
(iv) जिंक प्लेट
Right Answer: (a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)
लिथोग्राफी का आविष्कार एलॉय सेनेफेल्डर ने किया और यह चूना-पत्थर की समतल सतह पर तेल एवं जल की परस्पर विकर्षण क्रिया पर आधारित है। एचिंग में जिंक अथवा ताँबे की प्लेट पर मोमी आवरण चढ़ाकर सुई से रेखाएँ खींची जाती हैं और फिर अम्ल से उन्हें खोदा जाता है। रिलीफ छपाई में लकड़ी के ब्लॉक की सतह से अनावश्यक भाग काट दिया जाता है और शेष उभरे भाग से छाप ली जाती है। सेरोग्राफी अर्थात् स्क्रीन प्रिंटिंग में सिल्क अथवा संश्लेषित जाली पर स्टेंसिल बनाकर उसमें से रंग दबाया जाता है।
Q13. अभिकथन (A) : चित्रकारी (ड्राइंग) सभी दृश्य कलाओं का एक बुनियादी घटक है। कारण (R) : क्योंकि इसके बिना रूप और छवि नहीं बनाई जा सकती है। सही विकल्प चुनिए :
Right Answer: (A) और (R) दोनों सही हैं।
अभिकथन तथा कारण दोनों सही हैं और कारण अभिकथन की उचित व्याख्या भी करता है। रेखांकन अर्थात् ड्राइंग समस्त दृश्य कलाओं का आधारभूत घटक है, क्योंकि चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य, ग्राफिक कला तथा अनुप्रयुक्त कला — सभी में पहले रेखा द्वारा रूप का ढाँचा निर्धारित किया जाता है। रेखा ही आकार की सीमा तय करती है, अनुपात स्थापित करती है और आयतन का आभास देती है। इसीलिए कला-शिक्षा में रेखांकन को प्रथम एवं अनिवार्य अभ्यास माना जाता है और उसे ‘कला का व्याकरण’ कहा जाता है।
Q14. भारतीय कला जो अपने जटिल पैटर्न, चमकीले रंगों और मिट्टी, लकड़ी, पत्थर जैसी अप्रसंस्कृत सामग्रियों के उपयोग के लिए जानी जाती है :
Right Answer: लोक कला
लोक कला अपने जटिल अलंकरण-पैटर्न, चमकीले एवं सपाट रंगों तथा मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, गोबर, चावल के घोल एवं प्राकृतिक रंजकों जैसी अप्रसंस्कृत सामग्रियों के उपयोग के लिए जानी जाती है। यह किसी औपचारिक कला-विद्यालय में नहीं, बल्कि परिवार एवं समुदाय में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती है और प्रायः त्योहार, विवाह तथा अनुष्ठान से जुड़ी रहती है। इसमें परिप्रेक्ष्य एवं यथार्थ अनुपात के स्थान पर प्रतीकात्मकता तथा द्विआयामी सपाट चित्रण मिलता है। मधुबनी, वर्ली, गोंड, पट्टचित्र तथा कलमकारी इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
Q15. ई० बी० हेवेल किस समयावधि में मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट्स ऐण्ड क्राफ्ट्स के अधीक्षक थे ?
Right Answer: 1884-1892
ई० बी० हेवेल 1884 से 1892 तक मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स के अधीक्षक रहे। इसके बाद 1896 में वे कलकत्ता स्कूल ऑफ आर्ट के प्राचार्य नियुक्त हुए, जहाँ उन्होंने पाठ्यक्रम में आमूल परिवर्तन कर यूरोपीय अकादमिक यथार्थवाद के स्थान पर भारतीय परम्परा — अजन्ता के भित्तिचित्र, मुगल एवं राजपूत लघुचित्र — को केन्द्र में रखा। अबनीन्द्रनाथ टैगोर के साथ मिलकर उन्होंने बंगाल स्कूल की नींव रखी। उनकी पुस्तकें ‘इंडियन स्कल्पचर एण्ड पेंटिंग’ तथा ‘द आइडियल्स ऑफ इंडियन आर्ट’ इस आन्दोलन का वैचारिक आधार बनीं।
Q16. डॉ० आनन्द कुमारस्वामी के अनुसार मौर्य मूर्तिकला दो भागों में विभक्त है। उन्हें पहचानिए :
Right Answer: दरबारी कला और लोकप्रिय कला
डॉ० आनन्द कुमारस्वामी ने मौर्यकालीन मूर्तिकला को दो वर्गों में विभाजित किया — दरबारी कला तथा लोकप्रिय कला। दरबारी कला राजकीय संरक्षण में बनी और उसमें अशोक के एकाश्म स्तम्भ, उनके शीर्ष पर बने सिंह एवं वृषभ, तथा चमकदार मौर्य पॉलिश सम्मिलित है, जिसमें परिष्कार एवं तकनीकी उत्कृष्टता प्रधान है। लोकप्रिय कला जनसामान्य की परम्परा से निकली और उसमें दीदारगंज की चामरग्राहिणी यक्षी, परखम का यक्ष तथा टेराकोटा की मूर्तियाँ आती हैं, जिनमें स्थानीय स्वाद, स्थूलता एवं लोक-आस्था झलकती है। यह विभाजन आज भी मान्य है।
Q17. दिल्ली शिल्पी चक्र के सदस्य कौन थे ?
Right Answer: बी० सी० सान्याल, कंवल कृष्ण, के० एस० कुलकर्णी, धनराज भगत
दिल्ली शिल्पी चक्र की स्थापना 1949 में हुई और इसके प्रमुख सदस्य बी० सी० सान्याल, कंवल कृष्ण, के० एस० कुलकर्णी तथा धनराज भगत थे। विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आए कलाकारों ने इस समूह के माध्यम से राजधानी में आधुनिक कला की नींव रखी। इसका उद्देश्य कलाकारों को प्रदर्शनी का मंच देना, आपसी विचार-विमर्श बढ़ाना तथा भारतीय परम्परा एवं आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच सेतु बनाना था। इसी समय बम्बई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप तथा मद्रास में चोलामंडल कलाकार ग्राम जैसे प्रयास चल रहे थे।
Q18. उस गुफा की पहचान करें जिसमें एक के ऊपर एक लगभग 20 परतों में चित्रकारी की गई है :
Right Answer: भीमबेटका
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका की शैलाश्रय शृंखला में कुछ स्थानों पर लगभग बीस परतों में एक के ऊपर एक चित्रकारी की गई है, जो यह दर्शाता है कि इन आश्रयों का उपयोग हजारों वर्षों तक निरन्तर होता रहा। इसकी खोज 1957-58 में वी० एस० वाकणकर ने की और यूनेस्को ने 2003 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया। यहाँ लगभग सात सौ शैलाश्रय हैं, जिनमें से चार सौ से अधिक में चित्र मिलते हैं। ये चित्र पुरापाषाण काल से लेकर मध्यकाल तक के हैं और इनमें आखेट, नृत्य, पशु, घुड़सवार तथा युद्ध के दृश्य अंकित हैं।
Q19. सूची-I का सूची-II से मिलान कीजिए :
सूची-I
(a) अभय मुद्रा
(b) ध्यान मुद्रा
(c) धर्मचक्र मुद्रा
(d) भूमिस्पर्श मुद्रा
सूची-II
(i) उपदेश देना
(ii) डरो मत
(iii) धरती को छूना
(iv) ध्यान
Right Answer: (a)-(ii), (b)-(iv), (c)-(i), (d)-(iii)
बुद्ध की प्रतिमाओं में हस्त-मुद्राएँ उनके जीवन की विशिष्ट घटनाओं तथा उपदेशों का संकेत देती हैं। अभय मुद्रा में दाहिना हाथ कंधे तक उठा और हथेली सामने की ओर खुली रहती है, जो ‘डरो मत’ का आश्वासन देती है। ध्यान मुद्रा में दोनों हाथ गोद में एक के ऊपर एक रखे रहते हैं और यह समाधि की अवस्था दर्शाती है। धर्मचक्र मुद्रा में दोनों हाथ वक्ष के समीप चक्र की आकृति बनाते हैं, जो सारनाथ के प्रथम उपदेश का प्रतीक है। भूमिस्पर्श मुद्रा में दाहिना हाथ नीचे झुककर धरती को छूता है, जो बोधि-प्राप्ति के क्षण का स्मरण कराता है।
Q20. पटना, बिहार की 800 साल पुरानी जटिल और दुर्लभ कला कौन - सी है ?
Right Answer: टिकुली कला
टिकुली कला बिहार की लगभग आठ सौ वर्ष पुरानी जटिल एवं दुर्लभ कला है, जिसका केन्द्र पटना रहा है। मूल रूप से यह काँच पर सोने की पन्नी चढ़ाकर बनाई जाने वाली सुसज्जित बिन्दी अर्थात् टिकुली बनाने की परम्परा थी, जिसे विवाहित स्त्रियाँ माथे पर धारण करती थीं। इसमें अत्यन्त बारीक काम होता था और मुगलकाल में इसे विशेष संरक्षण मिला। बीसवीं शताब्दी में यह कला लगभग समाप्त हो चली थी, किन्तु उपेन्द्र महारथी के प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया और अब हार्डबोर्ड पर एनामेल रंगों से मधुबनी शैली के दृश्य बनाकर इसका आधुनिक रूप विकसित हुआ है।