Biology: 60 MCQs with Answers
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0%Q51. कॉलम-I को कॉलम-II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर चुनिए :
कॉलम-I
(a) ओपेरिन
(b) लैमार्क
(c) डार्विन
(d) ह्यूगो डीव्रीज
कॉलम-II
(i) अंगों का उपयोग व अनुपयोग
(ii) प्राकृतिक चयन द्वारा विकास
(iii) साल्टेशन
(iv) आजीवात्जनन
Right Answer: (a)-(iv), (b)-(i), (c)-(ii), (d)-(iii)
रूसी वैज्ञानिक ए० आई० ओपेरिन ने हैल्डेन के साथ आजीवात्जनन अर्थात् रासायनिक उद्विकास का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार आदिम पृथ्वी की अपचायक परिस्थितियों में सरल अकार्बनिक अणुओं से क्रमशः कार्बनिक अणु एवं जीवन उत्पन्न हुआ; मिलर एवं यूरे ने इसे प्रयोगशाला में सिद्ध किया। लैमार्क ने अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग तथा उपार्जित लक्षणों की वंशागति की बात कही। डार्विन ने विभिन्नता, जीवन-संघर्ष तथा प्राकृतिक चयन द्वारा विकास की व्याख्या की। ह्यूगो डीव्रीज ने ईवनिंग प्रिमरोज पर कार्य कर उत्परिवर्तनवाद अर्थात् साल्टेशन का सिद्धांत दिया।
Q52. कॉलम-I को कॉलम-II से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूटों की सहायता से सही उत्तर चुनिए :
कॉलम-I
(a) विभज्योतक ऊतक
(b) सरल ऊतक
(c) स्रावी ऊतक
(d) जटिल ऊतक
कॉलम-II
(i) दृढ़ोतक
(ii) जलरंध्र
(iii) पोषवाह
(iv) एधा
Right Answer: (a)-(iv), (b)-(i), (c)-(ii), (d)-(iii)
एधा अर्थात् कैम्बियम एक पार्श्व विभज्योतक है, जिसकी कोशिकाएँ निरन्तर विभाजित होकर द्वितीयक वृद्धि उत्पन्न करती हैं। दृढ़ोतक सरल स्थायी ऊतक है, क्योंकि वह केवल एक ही प्रकार की मोटी लिग्निनयुक्त मृत कोशिकाओं से बना होता है और पौधे को यांत्रिक दृढ़ता देता है। जलरंध्र अर्थात् हाइडेथोड स्रावी ऊतक का उदाहरण है, जिससे बिन्दुस्राव द्वारा तरल जल बाहर निकलता है। पोषवाह अर्थात् फ्लोएम जटिल ऊतक है, क्योंकि वह चालनी नलिका, सखी कोशिका, फ्लोएम मृदूतक तथा फ्लोएम रेशा — इन विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनता है।
Q53. प्रोस्टेग्लैंडिन व्युत्पन्न हैं :
Right Answer: वसा अम्ल के
प्रोस्टेग्लैंडिन वसा अम्ल से व्युत्पन्न होने वाले जैव-सक्रिय यौगिक हैं, जो बीस कार्बन वाले एरेकिडोनिक अम्ल से साइक्लो-ऑक्सीजिनेज एन्जाइम की क्रिया द्वारा बनते हैं। ये ईकोसैनॉइड वर्ग में आते हैं और इन्हें स्थानीय हार्मोन कहा जाता है, क्योंकि ये किसी विशिष्ट ग्रंथि में नहीं बनते तथा रक्त द्वारा दूर तक न जाकर अपने उत्पत्ति-स्थल के आसपास ही कार्य करते हैं। ये शोथ, ज्वर, पीड़ा-संवेदन, रक्त वाहिनियों के संकुचन-प्रसार, प्लेटलेट एकत्रीकरण तथा गर्भाशय संकुचन में भूमिका निभाते हैं। एस्पिरिन इन्हीं के संश्लेषण को अवरुद्ध कर पीड़ा एवं ज्वर घटाती है।
Q54. निम्नलिखित में से गलत जोड़ी अथवा जोड़ियों को नीचे दिये गये कूट की सहायता से चुनें :
(a) थियोफ्रेस्टस – स्पीशीज प्लांटेरम
(b) लिनियस – हिस्टोरिया प्लांटेरम
(c) गास्पर्ड बॉहिन – पीनेक्स थियेट्री बोटेनिसाय
(d) बेंथम और हुकर – जेनेरा प्लांटेरम
Right Answer: (a) और (b)
पहले दो युग्म आपस में उलट गए हैं, अतः वही गलत हैं। यूनानी विद्वान थियोफ्रेस्टस, जिन्हें वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है, ने ‘हिस्टोरिया प्लांटेरम’ की रचना की और लगभग पाँच सौ पौधों का वर्णन किया। कैरोलस लिनियस ने 1753 में ‘स्पीशीज प्लांटेरम’ प्रकाशित की, जिससे द्विनाम पद्धति स्थापित हुई। शेष दोनों युग्म सही हैं — गास्पर्ड बॉहिन ने ‘पीनेक्स थियेट्री बोटेनिसाय’ लिखी, जिसमें लिनियस से पूर्व ही द्विपद नामकरण का संकेत मिलता है, तथा बेंथम एवं हुकर ने ‘जेनेरा प्लांटेरम’ में प्राकृतिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया।
Q55. निम्नलिखित में से कौन - सा रोग हाइपरथायरॉइडिज़्म के कारण नहीं होता है ?
Right Answer: हाशिमोटो रोग
अवटु ग्रंथि की अतिसक्रियता अर्थात् हाइपरथायरॉइडिज्म से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। ग्रेव्स रोग, जिसे बेस्डो रोग तथा एक्सोफ्थैल्मिक गॉयटर भी कहा जाता है, इसका सर्वाधिक सामान्य रूप है, जिसमें नेत्रगोलक बाहर की ओर उभर आते हैं। प्लमर रोग अर्थात् विषाक्त बहुगुलिकीय गलगण्ड भी अतिसक्रियता से ही होता है। इसके विपरीत हाशिमोटो रोग एक स्वप्रतिरक्षी अवस्था है, जिसमें शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली अवटु ग्रंथि पर आक्रमण कर उसे नष्ट करने लगती है और परिणामस्वरूप हाइपोथायरॉइडिज्म अर्थात् हार्मोन की कमी हो जाती है।
Q56. निम्नलिखित में से कौन - सा कथन गलत है ?
Right Answer: संवर्धनीय मछली विपुल प्रजनक नहीं होनी चाहिए।
मत्स्य संवर्धन के लिए चुनी जाने वाली मछली में कुछ निश्चित गुण अपेक्षित होते हैं। वह तीव्र गति से बढ़ने वाली होनी चाहिए, ताकि कम समय में विपणन योग्य आकार प्राप्त हो; शाकाहारी अथवा प्लवक-भक्षी होनी चाहिए, जिससे आहार-लागत कम रहे; तथा स्वादिष्ट होनी चाहिए, अन्यथा बाजार में माँग नहीं बनेगी। चौथा कथन गलत है, क्योंकि संवर्धनीय मछली का विपुल प्रजनक होना वांछनीय गुण है — इससे पर्याप्त मात्रा में अंगुलिकाएँ सरलता एवं कम लागत पर उपलब्ध हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त उसका रोग-प्रतिरोधी एवं सीमित जल में अनुकूलनशील होना भी आवश्यक है।
Q57. फलों और बीजों के कठोर और पथरीले छिलकों की विशेषता होती है :
Right Answer: दृढ़कोशिकाएँ
फलों एवं बीजों के कठोर तथा पथरीले छिलके दृढ़कोशिकाओं अर्थात् स्क्लेरीड्स से बनते हैं। ये दृढ़ोतक का एक प्रकार हैं, जिनकी कोशिका भित्ति लिग्निन के जमाव से अत्यधिक मोटी हो जाती है, गुहा लगभग समाप्त हो जाती है और परिपक्व होने पर कोशिका मृत हो जाती है। इनकी भित्ति में सरल गर्त स्पष्ट दिखाई देते हैं। नारियल, अखरोट तथा बादाम के कठोर आवरण, नाशपाती के गूदे के कणिकामय पिण्ड तथा फलियों के बीजचोल इन्हीं से बनते हैं। ये बीज को यांत्रिक चोट, सूखने तथा कीटों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
Q58. मटर में निम्नलिखित में से किस लक्षण का अध्ययन मेंडल द्वारा नहीं किया गया था ?
Right Answer: पुष्प का आकार
ग्रेगर मेंडल ने उद्यान मटर पर अपने प्रयोगों में सात विपर्यासी लक्षण चुने — तने की लम्बाई, पुष्प का रंग, पुष्प की स्थिति, बीज का आकार, बीज का रंग, फली का आकार तथा फली का रंग। पुष्प का आकार इस सूची में सम्मिलित नहीं था। मेंडल की सफलता का बड़ा कारण यही था कि उन्होंने ऐसे लक्षण चुने जिनके केवल दो स्पष्ट एवं परस्पर विपरीत रूप थे, कोई मध्यवर्ती अवस्था नहीं थी। साथ ही मटर स्वपरागित होती है, एक ऋतु में ही जीवन-चक्र पूरा करती है और उसमें कृत्रिम परागण सरल है।
Q59. निम्नलिखित में से कौन - सी अवरोधिनी, यकृत - अग्न्याशयी वाहिनी की ग्रहणी में प्रवेश को नियंत्रित करती है ?
Right Answer: ओडी अवरोधिनी
यकृत से आने वाली सामान्य पित्त वाहिनी तथा अग्न्याशय से आने वाली अग्न्याशयी वाहिनी मिलकर यकृत-अग्न्याशयी वाहिनी बनाती हैं, जो ग्रहणी में हेपेटोपैंक्रियाटिक एम्पुला के द्वारा खुलती है। इस द्वार को घेरने वाली वर्तुल पेशी ओडी अवरोधिनी कहलाती है, जो पित्त एवं अग्न्याशयी रस के ग्रहणी में प्रवेश को नियंत्रित करती है। भोजन के अभाव में यह संकुचित रहती है, जिससे पित्त पित्ताशय में एकत्र होता रहता है, और वसायुक्त भोजन आने पर कोलेसिस्टोकाइनिन के प्रभाव से शिथिल हो जाती है। बोयडन अवरोधिनी सामान्य पित्त वाहिनी के अन्तिम भाग पर स्थित होती है।
Q60. काले पानी के बुखार का रोगजनक है :
Right Answer: प्लैज़्मोडियम फैल्सीपैरम
काले पानी का बुखार अर्थात् ब्लैकवाटर फीवर मलेरिया की एक गम्भीर एवं प्राणघातक जटिलता है, जिसका रोगजनक प्लैज़्मोडियम फैल्सीपैरम है। इसमें लाल रक्त कणिकाओं का व्यापक एवं तीव्र अपघटन होता है, जिससे मुक्त हीमोग्लोबिन रक्त में भर जाता है और वृक्कों द्वारा मूत्र के साथ बाहर निकलने लगता है; इसी कारण मूत्र का रंग गहरा लाल-काला हो जाता है और रोग को यह नाम मिला। इसके साथ तीव्र ज्वर, पीलिया, रक्ताल्पता तथा वृक्क निष्क्रियता हो जाती है। प्लैज़्मोडियम फैल्सीपैरम मस्तिष्कीय मलेरिया के लिए भी उत्तरदायी है।