Sociology: 60 MCQs with Answers
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0%Q51. घनश्याम शाह एवं अन्य ने ‘अनटचेबिलिटि इन रूरल इण्डिया’ में अस्पृश्यता की प्रघटना में तीन मुख्य पक्षों को सम्मिलित किया है, निम्नलिखित में से कौन-सा पक्ष इसमें उल्लेखित नहीं है ?
Right Answer: वंचन
घनश्याम शाह, हर्ष मंदर, सुखदेव थोरात, सतीश देशपांडे एवं अमिता बाविस्कर द्वारा किए गए इस व्यापक अध्ययन में ग्यारह राज्यों के पाँच सौ पैंसठ गाँवों का सर्वेक्षण हुआ। लेखकों ने अस्पृश्यता की प्रघटना को तीन मुख्य पक्षों में समझाया — बहिष्करण, जिसमें दलितों को मन्दिर, जलस्रोत तथा सार्वजनिक स्थलों से दूर रखा जाता है; अपमान एवं अधीनीकरण, जिसमें उन्हें प्रतिदिन के व्यवहार में हीन दर्शाया जाता है; तथा शोषण, जिसमें उनके श्रम का अनुचित लाभ उठाया जाता है। वंचन को उन्होंने पृथक पक्ष के रूप में नहीं गिनाया, यद्यपि वह इन तीनों का परिणाम है।
Q52. निम्नलिखित में से कौन वित्तीय पूँजी की विशेषता नहीं है ?
Right Answer: एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों का ह्रास
वित्तीय पूँजी की अवधारणा रुडोल्फ हिल्फर्डिंग ने दी और लेनिन ने साम्राज्यवाद के विश्लेषण में इसे आगे बढ़ाया। इसका अर्थ है बैंक पूँजी तथा औद्योगिक पूँजी का विलय, जिसमें बैंक पूँजी पर नियन्त्रण रखते हैं और उद्योगपति उसे उत्पादन में नियोजित करते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं — उत्पादन का केन्द्रीयकरण, बड़े एकाधिकारों एवं ट्रस्टों का निर्माण तथा पूँजी का निर्यात। स्पष्ट है कि वित्तीय पूँजी एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को बढ़ाती है, घटाती नहीं। इसलिए एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों का ह्रास इसकी विशेषता नहीं है।
Q53. निम्नलिखित में से संयोजन के स्तर (डिग्री ऑफ कम्पोजीशन) के आधार पर समाज के प्रकार में कौन-सा हरबर्ट स्पेन्सर ने नहीं उल्लेखित किया है ?
Right Answer: जटिल समाज
हरबर्ट स्पेन्सर ने उद्विकासीय दृष्टिकोण अपनाते हुए संयोजन के स्तर अर्थात् संरचनात्मक जटिलता के आधार पर समाजों का वर्गीकरण किया। उनके अनुसार सरल समाज वह है जो किसी अन्य समाज का अंग नहीं और जिसमें नेतृत्व या तो अनुपस्थित रहता है या अस्थायी। मिश्रित समाज कई सरल समाजों के संयोजन से बनता है और उसमें स्थायी नेतृत्व उभरता है। द्वि-मिश्रित समाज कई मिश्रित समाजों के मिलने से बनता है तथा त्रि-मिश्रित समाज आधुनिक राष्ट्र-राज्य जैसी विशाल इकाई है। ‘जटिल समाज’ को उन्होंने इस विशिष्ट श्रेणी-क्रम में नहीं रखा।
Q54. डेविड हेल्ड के अनुसार ऐसी कुछ अवधारणाएँ एवं मूल्य हैं जिनके द्वारा सभी के हितों के लिए वैश्वीकरण को प्राप्त किया जा सकता है। निम्नलिखित में से कौन-सी अवधारणा एवं मूल्य डेविड हेल्ड के द्वारा नहीं बताया गया है ?
Right Answer: सांस्कृतिक समरूपीयकरण
डेविड हेल्ड वैश्वीकरण के प्रमुख सिद्धान्तकारों में हैं और उन्होंने ‘विश्वजनीन लोकतंत्र’ की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका तर्क है कि वैश्वीकरण को सभी के हित में तभी मोड़ा जा सकता है जब वह कुछ आधारभूत मूल्यों पर आधारित हो — कानून का शासन, जो शक्ति को नियमों के अधीन लाए; सामाजिक न्याय, जो लाभ एवं भार का उचित वितरण सुनिश्चित करे; तथा आर्थिक निपुणता, जो संसाधनों का प्रभावी उपयोग करे। इनके साथ वे राजनीतिक समानता एवं लोकतांत्रिक जवाबदेही की बात भी करते हैं। सांस्कृतिक समरूपीयकरण उनका प्रस्तावित मूल्य नहीं, बल्कि वैश्वीकरण की एक आलोच्य प्रवृत्ति है।
Q55. उद्विकास की सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा का विवेचन करते हुए हरबर्ट स्पेन्सर किस वर्गीकरण का उल्लेख करते हैं ?
Right Answer: सैन्य समाज एवं औद्योगिक समाज
हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक परिवर्तन को उद्विकास की सार्वभौमिक प्रक्रिया माना, जिसमें समाज सरल एवं समरूप अवस्था से जटिल एवं विषमरूप अवस्था की ओर बढ़ता है। आन्तरिक नियमन के आधार पर उन्होंने समाज के दो प्रकार बताए। सैन्य समाज में युद्ध एवं प्रतिरक्षा प्रधान रहते हैं, केन्द्रीकृत अनिवार्य सहयोग होता है, व्यक्ति राज्य के अधीन रहता है और अनुशासन कठोर होता है। औद्योगिक समाज में उत्पादन एवं विनिमय प्रधान हो जाते हैं, सहयोग स्वैच्छिक एवं संविदात्मक होता है, व्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ती है और राज्य का कार्यक्षेत्र सीमित रह जाता है।
Q56. संस्कृति के विषय में स्टुअर्ट हाल के विचारों में निम्नलिखित में से कौन-सा पैराडिमिक बदलाव अभिव्यक्त होता है ?
Right Answer: ‘जीवन जीने के समग्र तरीके’ के रूप में संस्कृति से ‘सिगनिफाइंग प्रैक्टिस’ के रूप में संस्कृति की ओर
स्टुअर्ट हाल ब्रिटिश सांस्कृतिक अध्ययन के प्रमुख स्तम्भ थे और बर्मिंघम के समकालीन सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र से जुड़े रहे। उनके चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण पैराडिमिक बदलाव दिखाई देता है — रेमण्ड विलियम्स की ‘जीवन जीने के समग्र तरीके’ वाली संस्कृति की समझ से आगे बढ़कर संस्कृति को ‘सिगनिफाइंग प्रैक्टिस’ अर्थात् अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखना। हाल के अनुसार अर्थ वस्तुओं में पहले से निहित नहीं होता, बल्कि भाषा, प्रतीक एवं प्रतिनिधित्व की प्रक्रियाओं में गढ़ा जाता है। इसी से उनका ‘एन्कोडिंग-डिकोडिंग’ प्रतिमान विकसित हुआ।
Q57. निम्नलिखित समाजशास्त्रियों में से किन्होंने यह कहा कि धर्म एवं खेल (सहभागी एवं दर्शक) को प्रदर्शन उपभोग के उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है ?
Right Answer: थॉर्स्टिन वेब्लेन
थॉर्स्टिन वेब्लेन ने 1899 में प्रकाशित ‘द थ्योरी ऑफ द लेजर क्लास’ में प्रदर्शन उपभोग की अवधारणा दी। इसका अर्थ है वस्तुओं एवं सेवाओं पर ऐसा व्यय जो आवश्यकता पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के समक्ष अपनी सम्पन्नता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने के लिए किया जाए। उन्होंने धर्म तथा खेल — दोनों में सहभागी एवं दर्शक के रूप में — को भी प्रदर्शन उपभोग के उदाहरण माना, क्योंकि इनमें लगाया गया समय एवं धन उत्पादक नहीं होता, फिर भी सामाजिक हैसियत का संकेत देता है। उन्होंने ‘प्रदर्शन अवकाश’ की अवधारणा भी दी।
Q58. डॉ० बी० आर० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘द अनटचेबिल्स’ में ‘पराजित घुमन्तु’ (डिफीटेड नॉमेड्स) एवं ‘बिखरे हुए व्यक्तियों’ (स्ट्रे इन्डिविजुअल्स) जिन्हें संरक्षण एवं आवास की आवश्यकता थी की विवेचना करते हुए एक अवधारणा प्रयुक्त की है, जिसे कहा जाता है :
Right Answer: बिखरा मनुष्य (ब्रोकन मेन)
डॉ० बी० आर० अम्बेडकर ने 1948 में प्रकाशित अपनी कृति ‘द अनटचेबिल्स : हू वेयर दे एण्ड व्हाई दे बिकेम अनटचेबल्स’ में अस्पृश्यता की उत्पत्ति की मौलिक व्याख्या दी। उन्होंने ‘ब्रोकन मेन’ अर्थात् बिखरे मनुष्य की अवधारणा प्रस्तुत की। ये वे पराजित घुमन्तु कबीलों के बिखरे हुए व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना समुदाय खो दिया था और जो संरक्षण एवं आवास की तलाश में बसे हुए गाँवों के बाहरी छोर पर रहने लगे। अम्बेडकर के अनुसार इन्हीं लोगों ने बौद्ध धर्म बनाए रखा तथा गोमांस भक्षण नहीं छोड़ा, इसी कारण ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने उन्हें अस्पृश्य घोषित कर दिया।
Q59. निम्नलिखित समाजशास्त्रियों में से किन्होंने ‘प्रक्रिया भूमिका सिद्धान्त’ की रचना की है तथा ‘संरचनात्मक भूमिका सिद्धान्त’ के साथ मत भिन्नता को प्रस्तुत किया है ?
Right Answer: राल्फ एच० टर्नर
राल्फ एच० टर्नर ने प्रक्रिया भूमिका सिद्धान्त की रचना की और इसे संरचनात्मक भूमिका सिद्धान्त से स्पष्ट रूप से अलग बताया। संरचनात्मक दृष्टिकोण, जिसे लिंटन एवं पारसन्स ने विकसित किया, भूमिका को सामाजिक संरचना द्वारा पहले से निर्धारित अपेक्षाओं का निश्चित समुच्चय मानता है, जिसे व्यक्ति केवल निभाता है। इसके विपरीत टर्नर का तर्क है कि भूमिकाएँ पूर्वनिर्धारित नहीं होतीं, बल्कि अन्तःक्रिया के दौरान निरन्तर गढ़ी एवं संशोधित की जाती हैं। इसी को उन्होंने ‘रोल-मेकिंग’ कहा और बताया कि व्यक्ति दूसरों के व्यवहार से भूमिका का अनुमान लगाकर अपनी भूमिका रचता है।
Q60. समाज विज्ञान में इतिहास महत्वपूर्ण है (मैटर करता है), क्योंकि :
Right Answer: इतिहास सामाजिक प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
समाज विज्ञान में इतिहास इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक सामाजिक प्रक्रिया कालक्रम में घटित होती है और उसे उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ से काटकर नहीं समझा जा सकता। जाति, वर्ग, नगरीकरण अथवा राष्ट्रवाद जैसी परिघटनाएँ किसी एक क्षण की उपज नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रक्रियाओं का परिणाम हैं। सी० राइट मिल्स ने ‘समाजशास्त्रीय कल्पना’ में इसी को रेखांकित करते हुए कहा कि हमें व्यक्तिगत जीवनवृत्त, समाज की संरचना तथा इतिहास — तीनों के सम्बन्ध को एक साथ देखना चाहिए। इतिहास के बिना समाजशास्त्रीय व्याख्या स्थिर एवं अधूरी रह जाती है।