Sociology - Social Change and Development: 6 MCQs with Answers
Sociology- Social Change and Development
Your Progress
0%Q1. समाज का वह प्रकार, जिसमें बाजार विनिमय पर प्रभुत्व स्थापित करते हैं तथा अन्य स्वरूप-पारस्परिकता एवं पुनर्वितरण का बहिष्करण बढ़ता जाता है, कहलाता है :
Right Answer: बाजार समाज
Explanation:
कार्ल पोलानयी ने विनिमय के तीन स्वरूप बताए — पारस्परिकता, पुनर्वितरण तथा बाजार विनिमय। परम्परागत समाजों में पहले दो स्वरूप प्रधान रहते हैं, जहाँ वस्तुओं का आदान-प्रदान नातेदारी, कर्तव्य और सामुदायिक दायित्व से संचालित होता है। जिस समाज में बाजार विनिमय शेष दोनों स्वरूपों को हाशिये पर धकेलकर स्वयं प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, उसे बाजार समाज कहा जाता है। इसमें भूमि, श्रम और मुद्रा तक क्रय-विक्रय की वस्तु बन जाते हैं और सामाजिक सम्बन्ध अर्थव्यवस्था में समाहित होने के बजाय अर्थव्यवस्था के अधीन हो जाते हैं।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
Q2. जोखिम समाज (रिस्क सोसायटी) की अवधारणा का विवेचन करते हुए उलरिच बैक ने दो महत्वपूर्ण प्रत्ययों के मध्य अन्तर प्रस्तुत किया है। निम्नलिखित में से कौन-सा अन्तर सही है ?
Right Answer: निर्मित जोखिम एवं प्राकृतिक खतरे
Explanation:
उलरिच बैक ने अपनी कृति ‘रिस्क सोसायटी’ में बताया कि आधुनिक समाज की केन्द्रीय समस्या सम्पदा का वितरण नहीं, बल्कि जोखिमों का वितरण बन गई है। उन्होंने प्राकृतिक खतरों तथा निर्मित जोखिमों में स्पष्ट अन्तर किया। प्राकृतिक खतरे बाढ़, भूकम्प एवं सूखे जैसी घटनाएँ हैं, जो मानव नियंत्रण से बाहर की प्राकृतिक शक्तियों से उत्पन्न होती हैं। इसके विपरीत निर्मित जोखिम मानव के अपने वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय एवं औद्योगिक विकास की उपज हैं, जैसे परमाणु दुर्घटना, प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन। ये सीमाओं से परे होते हैं और वर्ग एवं राष्ट्र दोनों को पार कर जाते हैं।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
Q3. निम्नलिखित में से किस अभिकरण ने सतत विकास की अवधारणा को ‘एक ऐसा विकास जो वर्तमान की आवश्यकताओं को, भावी पीढ़ी की उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने की दक्षता से समझौता किये बिना, पूरा करता है’ के रूप में प्रस्तुत किया है ?
Right Answer: ब्रुन्डलैण्ड आयोग
Explanation:
सतत विकास की यह प्रसिद्ध परिभाषा 1987 में प्रकाशित ‘आवर कॉमन फ्यूचर’ नामक रिपोर्ट में दी गई थी। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग ने प्रस्तुत की, जिसकी अध्यक्षता नॉर्वे की तत्कालीन प्रधानमंत्री ग्रो हार्लेम ब्रुन्डलैण्ड ने की थी, इसीलिए इसे ब्रुन्डलैण्ड आयोग कहा जाता है। इसके अनुसार सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ी की अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता से समझौता किए बिना पूरा करे। इसी रिपोर्ट ने पर्यावरण और विकास को परस्पर विरोधी न मानकर एक-दूसरे का पूरक सिद्ध किया।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
Q4. वैश्वीकरण एवं संस्कृति सम्बन्धी विभिन्न भारतीय अध्ययनों में सांस्कृतिक परिवर्तन के पैटर्न्स की विवेचना में प्रयुक्त मुख्य अवधारणात्मक पैराडिग्म में निम्नलिखित में से कौन-सा गलत है ?
Right Answer: साम्राज्यवाद को अस्वीकृत करने हेतु मार्क्सीय विचारधारा
Explanation:
वैश्वीकरण और संस्कृति सम्बन्धी भारतीय अध्ययनों में सांस्कृतिक परिवर्तन की व्याख्या तीन प्रमुख अवधारणात्मक पैराडिग्म से की जाती है। समरूपीयकरण यह मानता है कि वैश्विक शक्तियाँ संस्कृतियों को एक जैसा बना रही हैं। विषमरूपीयकरण एवं हाइब्रिडिटी इसके विपरीत बताते हैं कि सम्पर्क से नई मिश्रित सांस्कृतिक रूपाकृतियाँ जन्म लेती हैं। देशजकरण एवं वैश्विक-स्थानीयकरण दर्शाते हैं कि वैश्विक तत्त्व स्थानीय सन्दर्भ में ढलकर ही स्वीकार किए जाते हैं। साम्राज्यवाद को अस्वीकृत करने वाली मार्क्सीय विचारधारा एक राजनीतिक दृष्टिकोण है, सांस्कृतिक परिवर्तन का पैराडिग्म नहीं।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
Q5. डेविड हेल्ड के अनुसार ऐसी कुछ अवधारणाएँ एवं मूल्य हैं जिनके द्वारा सभी के हितों के लिए वैश्वीकरण को प्राप्त किया जा सकता है। निम्नलिखित में से कौन-सी अवधारणा एवं मूल्य डेविड हेल्ड के द्वारा नहीं बताया गया है ?
Right Answer: सांस्कृतिक समरूपीयकरण
Explanation:
डेविड हेल्ड वैश्वीकरण के प्रमुख सिद्धान्तकारों में हैं और उन्होंने ‘विश्वजनीन लोकतंत्र’ की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका तर्क है कि वैश्वीकरण को सभी के हित में तभी मोड़ा जा सकता है जब वह कुछ आधारभूत मूल्यों पर आधारित हो — कानून का शासन, जो शक्ति को नियमों के अधीन लाए; सामाजिक न्याय, जो लाभ एवं भार का उचित वितरण सुनिश्चित करे; तथा आर्थिक निपुणता, जो संसाधनों का प्रभावी उपयोग करे। इनके साथ वे राजनीतिक समानता एवं लोकतांत्रिक जवाबदेही की बात भी करते हैं। सांस्कृतिक समरूपीयकरण उनका प्रस्तावित मूल्य नहीं, बल्कि वैश्वीकरण की एक आलोच्य प्रवृत्ति है।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
Q6. निम्नलिखित समाजशास्त्रियों में से किन्होंने यह कहा कि धर्म एवं खेल (सहभागी एवं दर्शक) को प्रदर्शन उपभोग के उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है ?
Right Answer: थॉर्स्टिन वेब्लेन
Explanation:
थॉर्स्टिन वेब्लेन ने 1899 में प्रकाशित ‘द थ्योरी ऑफ द लेजर क्लास’ में प्रदर्शन उपभोग की अवधारणा दी। इसका अर्थ है वस्तुओं एवं सेवाओं पर ऐसा व्यय जो आवश्यकता पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के समक्ष अपनी सम्पन्नता एवं सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने के लिए किया जाए। उन्होंने धर्म तथा खेल — दोनों में सहभागी एवं दर्शक के रूप में — को भी प्रदर्शन उपभोग के उदाहरण माना, क्योंकि इनमें लगाया गया समय एवं धन उत्पादक नहीं होता, फिर भी सामाजिक हैसियत का संकेत देता है। उन्होंने ‘प्रदर्शन अवकाश’ की अवधारणा भी दी।
No suggestions yet — be the first.
Your email will not be published. Suggestions are reviewed before appearing.
0 Comments
Be the first to comment.
Leave a comment
Your email will not be published. Comments are reviewed before appearing.