Sociology - Basic Concepts in Sociology: 6 MCQs with Answers
Sociology- Basic Concepts in Sociology
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0%Q1. निम्नलिखित में से कौन-सी ‘अनिवार्य उपस्थिति’ गलत है जब हम नृवंशीय समूह (एथनिक गु्रप) की मानक परिभाषा को अवधारणात्मक रूप देते हैं ?
Right Answer: प्रथागत व्यवहारों के विविधतामूलक समुच्चय
Explanation:
नृवंशीय समूह की मानक परिभाषा में तीन तत्त्वों की अनिवार्य उपस्थिति मानी जाती है। पहला है सामान्य वंशज की मान्यता, जो वास्तविक भी हो सकती है और काल्पनिक भी, क्योंकि महत्त्वपूर्ण यह है कि सदस्य स्वयं को एक ही मूल का मानते हों। दूसरा है सामाजिक रूप से प्रासंगिक सांस्कृतिक अथवा मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ, जैसे भाषा, धर्म एवं परम्पराएँ। तीसरा है एक सामाजिक श्रेणी के भीतर अभिवृत्तियों एवं व्यवहारों का साझा समुच्चय। प्रथागत व्यवहारों का विविधतामूलक समुच्चय इसमें नहीं आता, क्योंकि नृजातीयता का आधार साझापन है, विविधता नहीं।
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Q2. निम्नलिखित में से किस समाजशास्त्री ने सामाजिक समूहों के वर्गीकरण हेतु पन्द्रह मानदण्डों (क्राइटेरिया) को प्रस्तावित किया है ?
Right Answer: जॉर्जेज गुरविच
Explanation:
फ्रांसीसी समाजशास्त्री जॉर्जेज गुरविच ने सामाजिक समूहों के वर्गीकरण के लिए पन्द्रह मानदण्ड प्रस्तावित किए, जो समाजशास्त्र में सर्वाधिक विस्तृत वर्गीकरण योजनाओं में गिने जाते हैं। इनमें समूह का आकार, अवधि, कार्य, प्रवेश की सुगमता, चेतना का स्तर, संगठन की मात्रा, संस्तरण, प्रभुत्व का स्वरूप तथा सामाजिक नियंत्रण की पद्धति जैसे आधार सम्मिलित हैं। गुरविच का उद्देश्य यह दिखाना था कि सामाजिक वास्तविकता बहुस्तरीय एवं गतिशील है, इसलिए उसे किसी एक कसौटी से नहीं समझा जा सकता। थियोडोर मिल्स एवं होमन्स ने लघु समूहों पर कार्य किया।
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Q3. निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता समाजशास्त्र के साथ सम्बद्ध है ?
Right Answer: समाजशास्त्र ‘सामाजिक व्यवस्थाओं’ का वैज्ञानिक अध्ययन है।
Explanation:
समाजशास्त्र की सर्वमान्य विशेषता यह है कि वह सामाजिक व्यवस्थाओं, सामाजिक सम्बन्धों एवं सामाजिक संस्थाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है। इसका अर्थ है कि वह व्यवस्थित प्रेक्षण, प्रमाण-संग्रह तथा तार्किक विश्लेषण के माध्यम से निष्कर्ष निकालता है। यह ‘समाज कैसा होना चाहिए’ का नैतिक विवेचन नहीं करता, क्योंकि वह मूल्य-निर्णय दर्शन एवं नीतिशास्त्र का क्षेत्र है। यह सामाजिक कार्य का व्यावसायिक प्रशिक्षण भी नहीं है, यद्यपि सामाजिक कार्य उसकी अन्तर्दृष्टियों का उपयोग करता है। और न ही यह मात्र आँकड़े जुटाने वाला सामाजिक अंकगणित है।
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Q4. रॉबर्ट के० मर्टन के अनुसार ‘भूमिका सम्बन्धों का पूरक (कॉम्प्लीमेंट) जो व्यक्तियों के पास एक विशिष्ट प्रस्थिति की प्राप्ति के आधार के द्वारा पाया जाता है’, कहलाता है :
Right Answer: भूमिका-सेट (रोल - सेट)
Explanation:
रॉबर्ट के० मर्टन ने भूमिका-सेट की अवधारणा दी। इसका अर्थ है भूमिका सम्बन्धों का वह पूरक समुच्चय जो व्यक्ति को किसी एक विशिष्ट सामाजिक प्रस्थिति को धारण करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। उदाहरणतः विद्यालय के अध्यापक की एक ही प्रस्थिति उसे विद्यार्थियों, सहकर्मियों, प्रधानाचार्य तथा अभिभावकों के साथ अलग-अलग भूमिका सम्बन्धों में बाँध देती है। इससे भिन्न प्रस्थिति-सेट का अर्थ है वे सभी प्रस्थितियाँ जो एक ही व्यक्ति एक समय में धारण करता है। भूमिका-सेट के भीतर की परस्पर विरोधी अपेक्षाएँ भूमिका-तनाव को जन्म देती हैं।
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Q5. यह किनका मत है, ‘एक पारिभाषिक शब्द के रूप में सामाजिक संरचना को अन्तःसम्बन्धित संस्थाओं के विशिष्ट क्रम, अभिकरण एवं सामाजिक प्रतिरूप (पैटर्न) साथ ही प्रस्थिति एवं भूमिकाओं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति ने समूह में प्राप्त किया है, के ऊपर लागू किया जाता है’ ?
Right Answer: टालकट पारसन्स
Explanation:
यह परिभाषा टालकट पारसन्स की है, जिसमें सामाजिक संरचना को अन्तःसम्बन्धित संस्थाओं, अभिकरणों एवं सामाजिक प्रतिरूपों के विशिष्ट क्रम तथा समूह में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा धारण की गई प्रस्थितियों और भूमिकाओं पर लागू किया गया है। पारसन्स के प्रकार्यवादी चिन्तन में समाज एक व्यवस्था है, जिसकी आधारभूत इकाई भूमिका है और जिसके भाग एक-दूसरे से जुड़कर सन्तुलन बनाए रखते हैं। इसके विपरीत रैडक्लिफ-ब्राउन सामाजिक संरचना को वास्तव में विद्यमान व्यक्तियों के सम्बन्धों का जाल मानते थे, जबकि मर्टन ने मध्यम स्तरीय सिद्धान्तों पर बल दिया।
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Q6. समाज विज्ञान में इतिहास महत्वपूर्ण है (मैटर करता है), क्योंकि :
Right Answer: इतिहास सामाजिक प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
Explanation:
समाज विज्ञान में इतिहास इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक सामाजिक प्रक्रिया कालक्रम में घटित होती है और उसे उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ से काटकर नहीं समझा जा सकता। जाति, वर्ग, नगरीकरण अथवा राष्ट्रवाद जैसी परिघटनाएँ किसी एक क्षण की उपज नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रक्रियाओं का परिणाम हैं। सी० राइट मिल्स ने ‘समाजशास्त्रीय कल्पना’ में इसी को रेखांकित करते हुए कहा कि हमें व्यक्तिगत जीवनवृत्त, समाज की संरचना तथा इतिहास — तीनों के सम्बन्ध को एक साथ देखना चाहिए। इतिहास के बिना समाजशास्त्रीय व्याख्या स्थिर एवं अधूरी रह जाती है।
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