Physical Education - Yoga and Yogic Practices: 7 MCQs with Answers

Yoga and Yogic Practices - Physical Education
Physical Education - Yoga and Yogic Practices

Physical Education- Yoga and Yogic Practices

आसन, प्राणायाम, षट्कर्म, अष्टांग योग तथा सूर्य नमस्कार पर बहुविकल्पीय प्रश्न।

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Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राणायाम धातु के विकार को हटाता है ?

Right Answer: उज्जयी प्राणायाम


Explanation:

हठयोग प्रदीपिका में उज्जयी प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यह गले के कफ को दूर करता है, जठराग्नि को प्रदीप्त करता है तथा नाड़ी, जलोदर और धातुगत दोषों का नाश करता है। इसमें कण्ठ को हल्का संकुचित कर धीमी, गहरी एवं ध्वनियुक्त श्वास ली जाती है, जिससे समुद्र की लहरों जैसी हल्की आवाज उत्पन्न होती है। यह रक्तचाप एवं तनाव को नियंत्रित करता है और अनिद्रा में लाभकारी है। इसके विपरीत भस्त्रिका त्रिदोष का शमन करता है, कपालभाति शुद्धिकरण षट्कर्म है तथा मूर्छा प्राणायाम मन को शान्त कर मूर्छा जैसी अवस्था देता है।

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Q2. योगसूत्र किस अवस्था का वर्णन करता है, जिसमें स्वयं की चेतना के बिना अर्थ प्रकट होता है ?

Right Answer: समाधि


Explanation:

पतंजलि के योगसूत्र में अष्टांग योग के अन्तिम तीन अंग — धारणा, ध्यान तथा समाधि — मिलकर संयम कहलाते हैं। धारणा में चित्त को किसी एक स्थान पर बाँधा जाता है और ध्यान में उस विषय पर वृत्ति का अखण्ड प्रवाह बना रहता है। समाधि वह चरम अवस्था है जिसमें ध्याता, ध्यान एवं ध्येय का भेद मिट जाता है और, जैसा सूत्र कहता है, केवल अर्थ ही प्रकाशित होता है तथा स्वयं का स्वरूप मानो शून्य हो जाता है। इसे ‘तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः’ कहा गया है। प्रत्याहार तो इन्द्रियों को विषयों से लौटाने की क्रिया है।

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Q3. सूर्य नमस्कार के दौरान अश्वसंचालन आसन से कौन-सा मंत्र सम्बन्धित होता है ?

Right Answer: ओम्भानवे नमः


Explanation:

सूर्य नमस्कार बारह आसनों की एक क्रमबद्ध शृंखला है और प्रत्येक स्थिति के साथ सूर्य के एक नाम का मंत्र जोड़ा गया है। इसका चौथा आसन अश्वसंचालनासन है, जिसमें एक पैर पीछे ले जाकर दूसरे को दोनों हाथों के बीच रखते हुए दृष्टि ऊपर की जाती है, और इसके साथ ‘ॐ भानवे नमः’ मंत्र का उच्चारण किया जाता है। इससे पूर्व प्रणामासन के साथ ‘ॐ मित्राय नमः’, हस्त उत्तानासन के साथ ‘ॐ रवये नमः’ तथा पादहस्तासन के साथ ‘ॐ सूर्याय नमः’ बोला जाता है। यह अभ्यास लचक, शक्ति एवं श्वसन क्षमता तीनों बढ़ाता है।

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Q4. सूत्रनेति में सूती धागे की लम्बाई क्या होती है ?

Right Answer: 36 से 45 सेमी


Explanation:

सूत्रनेति हठयोग के षट्कर्मों में वर्णित नेति क्रिया का एक प्रकार है, जिसमें मोम लगे मुलायम सूती धागे को एक नासाछिद्र से डालकर मुख से बाहर निकाला जाता है और धीरे-धीरे आगे-पीछे खींचा जाता है। इस धागे की लम्बाई सामान्यतः 36 से 45 सेंटीमीटर रखी जाती है और मोटाई इतनी होनी चाहिए कि वह नासामार्ग में सरलता से जा सके। इससे नासामार्ग की गहरी सफाई होती है, श्लेष्मा हटता है और साइनसाइटिस, दमा, सिरदर्द तथा एलर्जी में लाभ मिलता है। इसे किसी अनुभवी शिक्षक के निर्देशन में ही करना चाहिए।

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Q5. शंखप्रक्षालन के दौरान आसनों का सही क्रम क्या होता है ?

Right Answer: ताड़ासन, तीर्यक ताड़ासन, कटिचक्रासन, तीर्यक भुजंगासन, उदरकर्शनासन


Explanation:

शंखप्रक्षालन सम्पूर्ण आहारनाल की शुद्धि की योगिक क्रिया है, जिसमें गुनगुना नमकीन जल पीकर पाँच आसनों की शृंखला की जाती है, ताकि जल आमाशय से आँतों की ओर आगे बढ़ता रहे। इसका सही क्रम है — ताड़ासन, तीर्यक ताड़ासन, कटिचक्रासन, तीर्यक भुजंगासन तथा उदरकर्शनासन। ताड़ासन जल को आमाशय से नीचे धकेलता है, तीर्यक ताड़ासन एवं कटिचक्रासन उसे छोटी आँत में आगे बढ़ाते हैं, तीर्यक भुजंगासन उदर को मरोड़ देता है और उदरकर्शनासन जल को बड़ी आँत की ओर ले जाता है। यह किसी योग्य मार्गदर्शक की देखरेख में ही करना चाहिए।

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Q6. वायु द्वारा आँतों को साफ करना कहलाता है :

Right Answer: वत्सार धौति


Explanation:

धौति हठयोग के षट्कर्मों में सर्वप्रथम आती है और इसके अनेक भेद हैं। वत्सार धौति वह क्रिया है जिसमें वायु को काकी मुद्रा द्वारा निगलकर आमाशय एवं आँतों में भेजा जाता है और फिर उसे गुदा मार्ग से बाहर निकाला जाता है; इस प्रकार आँतों की सफाई वायु के द्वारा होती है। इसके विपरीत वरिसार धौति में जल पीकर आँतें साफ की जाती हैं और इसे ही शंखप्रक्षालन कहा जाता है। वहनिसार धौति में उदर को अग्नि-तत्त्व की भाँति भीतर-बाहर करके जठराग्नि प्रदीप्त की जाती है, तथा वमन धौति में जल पीकर उसे उलटी द्वारा निकाला जाता है।

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Q7. शारीरिक और मानसिक शुद्धता प्राप्त करने का योग है :

Right Answer: हठ योग


Explanation:

हठ योग वह मार्ग है जिसका उद्देश्य शरीर एवं मन दोनों की शुद्धता प्राप्त करना है, ताकि साधक ध्यान एवं समाधि की उच्चतर अवस्थाओं के योग्य बन सके। ‘ह’ का अर्थ सूर्य तथा ‘ठ’ का अर्थ चन्द्र माना जाता है, अर्थात् शरीर की दो विपरीत ऊर्जाओं का संतुलन। इसके प्रमुख अंग हैं षट्कर्म अर्थात् छह शुद्धिक्रियाएँ, आसन, प्राणायाम, मुद्रा तथा बंध। स्वात्माराम रचित हठयोग प्रदीपिका इसका आधार ग्रन्थ है। इसके विपरीत कर्म योग निष्काम कर्म का, ज्ञान योग विवेक एवं आत्मबोध का तथा राज योग पतंजलि के अष्टांग मार्ग का पथ है।

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Published: 03 August 2026 | Last Updated: 19 August 2026 |


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Deepak - Educational Content Creator

Written by Deepak

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I am an educational content creator dedicated to making learning simple, engaging, and accessible for students preparing for competitive exams. He specializes in creating high-quality study materials, including notes, multiple-choice questions (MCQs), previous year question papers, practice tests, and exam-oriented resources.

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